शाश्‍वत विकास हेतु जनकल्याणकारी ‘हिन्दू राष्ट्र’ ही अनिवार्य !

शाश्‍वत विकास हेतु जनकल्याणकारी ‘हिन्दू राष्ट्र’ ही अनिवार्य !

हिन्दूद्वेषियों द्वारा ‘हिन्दुत्व’ एवं ‘विकास’ ये दोनों सूत्र परस्परविरोधी होने का चित्र दर्शाया जाता है । आजकल ‘हिन्दुत्व का अर्थ प्रतिगामिता और हिन्दुत्व के त्याग का अर्थ आधुनिकतावाद’, इस प्रकार एक भ्रम का वातावरण बनाया गया है । इस भ्रम के जाल में भले-भले फंस गए हैं । ‘बहुमत से सत्ता प्राप्त कर भी भाजपा द्वारा वर्ष २०१४ से हिन्दुत्वविरहीत विकास के नारे दिए जाना’, यह इसी का एक उदाहरण है ! किंतु यह ध्यान में रखना होगा कि, विकास हेतु धर्माधारित हिन्दुत्व को ही अपनाना आवश्यक है । प्राचीन काल में भारत वैभव के शिखरपर था, जब सनातन वैदिक हिन्दू धर्म को समाज के साथ राज्यव्यवस्था में भी प्रतिष्ठा प्राप्त थी । इसलिए यदि शाश्‍वत विकास साध्य करना हो, तो सनातन धर्मराज्य अर्थात हिन्दू राष्ट्र की स्थापना आवश्यक है ।
भ्रष्टाचार निर्मूलन एवं साधना !
भौतिक विकास में भ्रष्टाचार एक महत्त्वपूर्ण बाधा है । भले ही भ्रष्टाचार निर्मूलन और पारदर्शिता की कितनी भी बातें की जाए; परंतु वास्तविकता यह है कि आज भी भारत में बडी मात्रा में भ्रष्टाचार हो रहा है । नोटबंदी के पश्‍चात ‘ट्रान्स्परेंसी इंटरनैशनल’ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में ४५ प्रतिशत लोगों द्वारा घूस दिए जाने की बात कही गई है । इस निरीक्षण में यह स्पष्ट हुआ है कि नगरपालिका, पुलिस,करसंकलन विभाग, बिजली विभाग, संपत्ति पंजीकरण कार्यालय आदि विभागों में भ्रष्टाचार की ८४ प्रतिशत घटनाएं हुई हैं । इससे एक बात स्पष्ट होती है कि भले ही भ्रष्टाचार निर्मूलन हेतु कितने भी कानून बनाए जाएं; परंतु ऐसा नहीं है कि, उससे भ्रष्टाचारघटा है । आर्य चाणक्य ने कहा था, ‘जिस प्रकार से मछली पानी कब पीती है,यह ज्ञात नहीं होता, उसी प्रकार से प्रशासनिक अधिकार कब भ्रष्टाचार करता है, यह भी ज्ञात नहीं होता ।’ आचार्य चाणक्य केवल अपना निरीक्षण बताकर नहीं रुके, अपितु उन्होंने भ्रष्टाचारपर रोक लगाने हेतु अलग-अलग समाधान योजनाएं तथा दंड भी बताए हैं । आज उनके क्रियान्वयन की आवश्यकता है । स्वतंत्रता के पश्‍चात राज्यकर्ताओं ने यदि जनता को साधना सिखाई होती, तो आज भ्रष्टाचार का यह भस्मासुर खडा नहीं हो पाता । समाज सत्त्वगुणी हो, को केवल आर्थिक ही नहीं, अपितु नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक आदि स्तरोंपर होनेवाले भ्रष्टाचारपर रोक लगाई जा सकती है; किंतु यदि नैतिकता और संस्कारों की पूंजी ही अपूर्ण हो, तो कानून से भागने के मार्ग भी निकलते ही हैं ! किसी भी प्रकार के कानून व्यक्ति की मानसिकता को बदल नहीं सकते । व्यक्ति के आचार एवं विचारों में सकारात्मक परिवर्तन लाने हों, तो उसके लिए साधना के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है, यही इससे अधोरेखित होता है ।
‘व्यक्तिपरिवर्तन’ कब ?
चुनाव के समय देश में सत्ता परिवर्तन की चर्चाएं होती हैं । कभी-कभी व्यवस्था परिवर्तन के विषय में भी चर्चा होती है; किंतु व्यक्ति परिवर्तनपर उतना बल नहीं दिया जाता और उसी कारण अपेक्षित फलोत्पत्ति नहीं मिलती । 2 वर्ष पूर्व मुंबई-गोवा मार्गपर ‘तेजस’ नामक शीघ्रगति अत्याधुनिक रेलगाडी आरंभ की गई; परंतु इस गाडी की पहली ही यात्रा के समय यात्रियों ने गाडी में लगाए गए १२ माईक्रोफोन्स चुरा लिए तथा गाडी में लगाए गए कुछ ‘टच स्क्रीन्स’को भी हानि पहुंचाई । ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं । महाविद्यालयीन शिक्षा का स्तर ऊंचा हो; इसके लिए ‘नैक’ मूल्यांकन प्रणाली लागू की गई; किंतु आज भी महाविद्यालयों द्वारा ‘कागदपत्रों के खेल’ कर भ्रमित करने का प्रयास किया जाता है, यह वास्तविकता है । साक्षरता की मात्रा बढाने के लिए वास्तविक प्रयास करने के स्थानपर ‘८वीं कक्षा तक के सभी छात्रों को उत्तीर्ण करने’ का जो निर्णय किया गया था, वह भी इसी प्रकार का था ।सामान्य लोगों को न्याय मिलने के लिए आज न्यायालयीन व्यवस्था कार्यरत है; परंतु लंबित अभियोग एवं न्यायालयीन प्रक्रिया की आज की स्थिति देखने पर प्रश्‍न उपस्थित होता है कि, आज ‘सामान्य लोगों को न्याय मिलता है अथवा केवल निर्णय ?’ गांव-नगरों के योजनाबद्ध विकासके नामपर भी केवल शोर है । तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति विकास का केंद्रबिंदु है, वह जबतक कर्तव्यनिष्ठ एवं सुसंस्कारित नहीं होता , तबतक किए जानेवाले विकास को एक प्रकार से भ्रम ही कहना पडेगा । विकसित सामग्री का उपयोग क्यों और कैसे करना है, इसका योग्य निर्णय करने हेतु व्यक्ति की बुद्धि का सात्त्विक होना आवश्यक है । विकसित एवं आधुनिक उपकरणों की सहायता से आज केवल मनुष्य का समय बच रहा है; परंतु इस शेष समय में क्या करना है, इसका निर्णय उसी व्यक्ति को करना होता है और व्यक्ति यदि सुसंस्कारित हो, तभी बचे हुए समय का सदुपयोग हो सकता है ।
धर्मशिक्षा आवश्यक !
समाज के केवल भौतिक विकास से काम नहीं चलता, अपितु समाज का मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास भी होना पडता है । उसके लिए जनता को धर्मशिक्षा मिलना और नागरिकों द्वारा धर्माचरण आवश्यक है; किंतु दुर्भाग्यवश प्रचलित व्यवस्था में धर्मशिक्षा की व्यवस्था नहीं है । विद्यालयों में भगवद्गीता के शिक्षा की बात आते ही देश के आधुनिकतावादियों की टोली तुरंत ही ‘भगवाकरण’ का आक्रोश करने लगती है;परंतु अब उनकी ओर ध्यान न देकर जिनमें सनातन धर्म के प्रति निष्ठा है, उन्हें उपलब्ध सभी माध्यमों से धर्म का प्रसार, प्रचार एवं धर्म की रक्षा के दायित्व का निर्वहन करना होगा ।
अधिवेशन में विचारमंथन !
इसी उदात्त एवं जनकल्याण हेतु विगत ७ वर्षों से गोवा में आयोजित किए जा रहे अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशनों में हिन्दूसंगठन के साथ-साथ साधना, धर्माचरण,धर्मशिक्षा, प्राचीन भारतीय परंपराओं के पुनरुज्जीवन से संबंधी विचारमंथन हो रहा है । प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी सैकडों हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के प्रतिनिधि इस अष्टम अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन में सम्मिलित हो रहे हैं । ‘ज्योत से ज्योत जगाते चलो’ इस भाव से अधिवेशन में सहभागी हिन्दुत्वनिष्ठ अधिवेशन के पश्‍चात अपने क्षेत्र वापस लौटनेपर सनातन धर्म का प्रसार करते हैं । स्वतंत्रता के पश्‍चात किसी भी राजनीतिक दल ने सनातन धर्म की वैभवशाली परंपराओं की स्मृतियों को जगाने का प्रयास नहीं किया । शाश्‍वत विकास हेतु हिन्दू राष्ट्र ही आवश्यक है, यह जब शासनकर्ताओं की समझ में आ जाएगा, तब ही वास्तव में ‘अच्छे दिन’ आएंगे और यही इन अधिवेशनों की फलोत्पत्ति होगी ।
सुन्दर कुमार (प्रधान सम्पादक)

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मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

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