शिवलिंगोपासना

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी (प्रबंध संपादक)
निर्गुण-निराकार रूप में शिवलिंगोपासना की विशेष महिमा पुराणों में बतायी गयी है। पूजन के पूर्व नव निर्मित शिवलिंग की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। वाण लिंग एवं नर्मदेश्वर लिंग स्वप्रतिष्ठित माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त मन्दिर आदि स्थानों में पूर्व प्रतिष्ठित लिंग, स्वयम्भू लिंग तथा ज्योतिर्लिंग आदि देवों की उपासना में विशेष रूप से पार्थिव-लिंग-पूजन में प्रतिष्ठा तथा आवाहन विसर्जन आवश्यक होता है। शास्त्रों में यहाँ तक विवेचित है कि शिवलिंग में सभी देवताओं का पूजन किया जा सकता है-
शिवचलिंगेऽपिसर्वेषांदेवानांपूजनंभवेत् ।
सर्वलोकमयेअस्माच्छिवशक्तिर्विभुःप्रभुः ।। द्रष्टव्य बृहद्धर्मपुराण, अ. 57 /16
पुराण ग्रन्थों का अनुशीलन करने से शिवोपासना के परिप्रेक्ष्य में लिंग के स्वरूप, निर्माण उपासना विधि तथा उसके महत्ता का विशद् विवेचन मिलता है। कूर्म पुराण में लिंग को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि जिसमें सभी कुछ लय हो जायें, वही लिंग है वही ब्रह्म शरीर ही है।
स्कन्द पुराण में ‘लयनाल्लिंगमुच्यते’ कहा है जिसका अर्थ लय या प्रलय होता है, इसीलिए उसे लिंग कहते हैं। प्रलय का लिंग से सम्बन्ध के सन्दर्भ में विवेचनीय है कि प्रलय की अग्नि में सभी कुछ भस्म होकर शिवलिंग में समा जाता है। शिवजी की स्थूल मूर्ति को शिवलिंग कहते हैं ब्रह्माण्ड इनका लिंग है अर्थात् ज्ञापक है। उस लिंग का ब्रह्मा और विष्णु भी आदि अन्त न पा सके। शिव वस्तुतः ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ही है, यही तात्पर्य बताना उसका अभिप्राय था।
शिव के सम्बन्ध में मात्र से प्रकृति स्वयं विकाररूप में प्रवाहित होती है। इसलिए अर्घा गोल नहीं, किन्तु दीर्घ होता है। लिंग पुराण के अनुसार लिंग के मूल में ब्रह्म, मध्य में विष्णु, ऊपर प्रणवात्मक शंकर हैं। लिंग परमेश्वर, अर्घा महादेवी हैं-
मूलेब्रह्मातथामध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः ।
रूद्रोपरिमहादेवःप्रणवारव्यः_सदाशिवः ।।
लिंगवेदीमहादेवीलिंग_साक्षान्महेश्वर।
तयोःसमपूजवान्नित्यंदेवीदेवश्चपूजितो।।लिंग पु: 1.186-7

लिंगोत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए शिव पुराण में कहा गया है कि शिवशक्ति के चिन्ह का सम्मेलन ही लिंग है-
लिंगमर्थहिपुरुषंशिवंगमयतीत्यदः ।
शिवशक्त्योश्चचिह्नस्यमेलनं_लिंगमुच्यते।। शि.पु., विद्येश्वर संहिता, 25.5

लिंग में विश्वप्रसूतिकर्ता की अर्चा करनी चाहिए। यह परमार्थ शिव तत्व का गमक, बोध होने से भी लिंग कहलाता है। प्रणव भी भगवान का ज्ञापक होने से लिंग कहा गया है। पंचाक्षर उसका स्थूल रूप है।
शिव पुराण के अनुसार लिंग अर्थात्र अव्यक्तावस्थापन्न वस्तु के गमक अर्थात बतलाने वाले चिन्ह को लिंग कहते हैं। “भ” अर्थात् वृद्धि और “ग” अर्थात प्राप्त होने वाली वस्तु को भग कहते हैं जो प्रकृति नाम से अभिहित की जाती है। अन्ततः प्रकृति का नाम भग है। भग के अधिष्ठाता शिव का नाम भगवान है।
लिंग की उत्पत्ति के परिप्रेक्ष्य में एक वृत्तान्त लिंग पुराण में इस प्रकार मिलता है, एक बार विष्णु और ब्रह्मा में इस विषय पर विवाद पैदा हो गया कि परमेश्वर कौन है? दोनो ही अपने को ईश्वर सिद्ध करने के लिए प्रयत्नशील थे। इस पर ब्रह्म और विष्णु में कलह ही हो रहा था कि एक अति प्रकाशमान ज्योतिर्लिंग उत्पन्न हुआ। उस लिंग के प्रादुर्भाव को देखकर दोनों ने उसे अपनी कलह-निवृत्ति का साधन समझ कर यह निश्चय किया कि जो कोई इस लिंग के अन्तिम भाग को स्पर्श करे वही परमेश्वर है। वह लिंग नीचे और ऊपर दोनों ओर था। ब्रह्मा जी तो हंस बनकर लिंग का अग्रभाग ढूढ़ने के लिए ऊपर उड़े और विष्णु अति विशाल एवं सुदृढ वराह बनकर लिंग के नीचे की ओर प्रवेश किया। इसी भाँति दोनों हजारों वर्षों तक चलते रहे, परन्तु लिंग का न अन्त मिला और न कोई आदिसूत्र मिला। ऐसी स्थिति में दोनों अत्यन्त व्याकुल होकर लौटते हुए बारम्बार उस परमेश्वर को प्रणाम कर उसकी माया से मोहित होकर विचार करने लगे कि क्या बात है कि जिसका कहीं न अन्त है और न आदि है। वे ऐसा विचार कर ही रहे थे कि अचनक प्लुतस्वर से ‘ॐ’, ‘ॐ’ शब्द सुनाई पड़ा। शब्दानुसंधान करके लिंग की दक्षिण ओर देखा तो ऊँकार स्वरूप स्वयं शिव विराजमान थे।
इस पर भगवान विष्णु ने शिव की स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर महादेव जी ने कहा-‘हम तुमसे प्रसन्न हैं, तुम भय छोड़कर हमारा दर्शन करो। तुम दोनों ही हमारी शरीर से उत्पन्न हुए हो। सब सृष्टि के उत्पन्न करने वाले ब्रह्मा हमारे दक्षिण अंग से और विष्णु वाम अंग से उत्पन्न हुए हैं, वर माँगो। विष्णु और ब्रह्मा ने शिव जी के चरणों में दृढ़ भक्ति माँगी। माघ कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि के दिन कोटि सूर्य के समान परम् तेजोमय शिवलिंग का प्रार्दुभाव हुआ है। शिव पुराण के अनुसार एकमात्र शिव ही निर्गुण-निराकार होने से निष्फल हैं, शेष सभी सगुण विग्रहयुक्त होने से सकल कहे जाते हैं। निष्कल होने से ही शिव का निराकार (आकार विशेष शून्य) लिंग की पूज्य होता है। शिव सकल, निष्फल दोनों ही हैं, अतः उनका निराकार लिंग और साकार स्वरूप दोनों ही पूज्य होते हैं।
सब विग्रहों में शिवलिंग ‘एकोऽहं द्वितीयो नास्ति’ का प्रतीक है तथा उस पर जल छोड़ने का अर्थ ब्रह्म में प्राणलीन करना है। इस प्रकार शिवोपासना करने से भगवान शिव सभी प्रकार से सबका कल्याण-मंगल करते हैं।

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