श्राद्ध कर्म सम्बन्धित प्रश्न और समाधान

 श्राद्ध कर्म सम्बन्धित प्रश्न और समाधान……

प्रश्न : कौए का पिंड को न छूना, क्या दर्शाता है ? ऐसे में क्या करना चाहिए ? 

उत्तर : किसी लिंगदेह की इच्छा पूर्ण करने हेतु कोई वचनबद्ध न हो, तो उससे निकलनेवाली मारक तरंगों के कारण कौआ पिंड के पास आकर भी उसे स्पर्श नहीं कर पाता । जिस समय लिंगदेह की अतृप्त इच्छाएं पूरी नहीं होती, उस समय लिंगदेह से तमोगुणी मारक शक्ति की तरंगों का वातावरण में तथा कौए की ओर प्रक्षेपण होता रहता है । वे तरंगें कौए को अनुभव होती हैं तथा उन तरंगों के कारण कौआ पिंड को स्पर्श नहीं करता ।

कौएद्वारा पिंड को न छूए जाने पर अपनाने हेतु पर्याय : बहुत प्रतीक्षा करने पर भी कौआ पिंड को न छूए एवं ज्ञात न हो कि, उस मृत शक्ति की कौनसी इच्छा अपूर्ण है, तो इच्छापूर्ति का आश्‍वासन नहीं दिया जा सकता । कभी-कभी चौबीस घंटे बीतने पर भी कौआ पिंड को नहीं छूता । ऐसे में दर्भ का कौआ बनाकर पिंड को छुआते हैं ।

 

प्रश्न : कैसे समझें कि परिवार में पूर्वजों का कष्ट है ?

उत्तर : हमें पूर्वज कष्ट दे रहे हैं अथवा कष्ट की आशंका है, इस विषय में उन्नत पुरुष (संत) ही बता सकते ह्ंै। ऐसे उन्नत पुरुष न मिलें, तो सामान्यतः मान सकते हैं कि, आगे दिए कुछ प्रकार के कष्ट पूर्वजों के कारण होते हैं – घर में निरंतर लडाई-झगडे होना, एक-दूसरे से अनबन, चाकरी (नौकरी) न मिलना, घर में पैसा न टिक पाना, किसी को गंभीर बीमारी होना, स्थिति अनुकूल होने पर भी विवाह न होना, पति-पत्नी में अनबन, गर्भधारण न होना, गर्भपात होना, यदि संतान का जन्म हो तो वह मतिमंद अथवा विकलांग होना एवं कुटुंब के किसी सदस्य का व्यसनी होना । श्राद्धविधि से पितर संतुष्ट होते हैं और आशीर्वाद देते हैं, साथ ही मर्त्यलोक में अटके हुए पूर्वजों को गति प्राप्त होती है तथा उनके कारण हमारे कष्टों का निवारण होता है ।

 

प्रश्न : श्राद्ध से पितरों को सद्गति कैसे मिलती है ?

उत्तर : श्राद्ध के मंत्रोंद्वारा निर्माण होनेवाली तरंगें, ब्राह्मणों के आशीर्वाद, सगे-संबंधियों की सदिच्छाएं एवं पिंडदान जैसी कर्मकांड की विधियों का अलौकिक परिणाम होता हैं । इन परिणामों को तर्कद्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता । इससे लिंगदेह के सर्व ओर कवच का निर्माण होता है एवं उसे आगे की गति मिलती है । नरक, भुवर्लोक, पितृलोक एवं स्वर्ग में इन विधियों का लाभदायक परिणाम होता है ।

जब तक गर्भाशय से बालक सुरक्षित बाहर नहीं निकलता, तब तक मां उसे सुरक्षा-कवच देती है, उसी प्रकार श्राद्ध की विधियोंद्वारा पितरों के लिए भी समय-समय पर सुरक्षा-कवच की पूर्ति की जाती है ।

 

 

प्रश्न : श्राद्ध में पितरों को अर्पित अन्न, उन तक कैसे पहुंचता है ?

उत्तर : मत्स्यपुराण में (अध्याय १९, श्‍लोक ३ से ९, अध्याय १४१, श्‍लोक ७४-७५) श्राद्ध के संदर्भ में एक प्रश्र उपस्थित किया गया है, जो इस प्रकार है – ब्राह्मणोंद्वारा खाया हुआ या होमाग्नि में अर्पित अन्न मृतात्माओं को कैसे प्राप्त होता है ? इसलिए कि मृत्यु के पश्‍चात आत्माएं पुनर्जन्म प्राप्त कर दूसरी देह में आश्रय लेती हैं । इसका उत्तर वहीं दिया हुआ है, जो इस प्रकार है – वसु, रुद्र तथा आदित्य, इन पितृदेवताओंद्वारा वह अन्न पितरों को प्राप्त होता है अथवा वे अन्न भिन्न पदार्थों, जैसे अमृत, तृण, भोग, वायु आदि में रूपांतरित होकर भिन्न-भिन्न योनि के पितरों को मिलते हैं ।

 

प्रश्न : श्राद्धकर्म में कौन-सी वस्तुएं वर्जित हैं और क्यों ?

उत्तर : श्राद्ध के लिए निषिद्ध पदार्थ हैं – प्याज, लहसुन, नमक, बैंगन, मटर, हरीक एवं पुलक नाम के चावल, रामदाना, मुनगा (सहिजन), गाजर, कुम्हडा, किडंग (एक आयुर्वेदिक औषधि), चिचडा, मांस, काला जीरा, काली मिर्च, काला नमक, शीतपाकी, अंकुरित होनेवाला अनाज, सिंघाडा, जामुनी रंग के एवं सडे-गले पदार्थ । इसका कारण है ये पदार्थ तमोगुण बढानेवाले हैं । तमोगुण जडत्व बढाता है । ऐसा अन्न ग्रहण करनेवाले पितरों में जडत्व की निर्मिति होकर उनकी आगे की गति बाधित होती है ।

 

प्रश्न : श्री गणेशचतुर्थी-काल में कुछ लोग २१ दिन का गणपति बैठाते हैं । तब, क्या उस काल में घर में श्राद्ध करना उचित रहेगा ?

उत्तर : शास्त्र में जिस कार्य के लिए जो समय बताया गया है, वह कार्य उस समय करना उचित है । इसलिए, पितृपक्ष में ही महालय श्राद्ध करना चाहिए । श्री गणेशचतुर्थी पर किसी का वार्षिक श्राद्ध हो, तो उस दिन वह श्राद्ध करना चाहिए । श्राद्ध के लिए बनाए गए भोजन का भोग श्री गणपति को लगाएं । सर्वसाधारणतः, जबतक सूर्य वृश्चिक राशि में रहते हैं, तबतक ही महालयश्राद्ध करने के लिए कहा गया है । पितृपक्ष में महालय श्राद्ध करने के विषय में भिन्न-भिन्न मत हैं । आजकल मृत व्यक्ति का उसकी मृत्यु की तिथि पर ही पितृपक्ष में एक दिन महालय श्राद्ध किया जाता है । जिनके घर २१ दिन के गणपति का पूजन होता है, उस काल में श्राद्ध की तिथि आ जाए, तब भी उन्हें उसी तिथि पर महालय श्राद्ध करना चाहिए । श्राद्ध में बने हुए भोजन का भोग श्रीगणपति को लगाना चाहिए । परंतु, श्राद्ध के दिन अन्य अनुष्ठान न करें; उदा. श्रीगणेशयज्ञ, लघुरुद्र यज्ञ आदि अनुष्ठान न करें । जो लोग जननाशौच अथवा मरणाशौच (सूतक) अथवा किसी अन्य कारण से उस तिथि पर महालय श्राद्ध नहीं कर सकते, वे सर्वपित्री अमावास्या पर करें । अन्यथा, सुविधानुसार, कृष्णपक्ष की अष्टमी, द्वादशी, अमावस्या और व्यतिपात योग पर भी, महालय श्राद्ध कर सकते हैं ।

 

प्रश्न : श्राद्धकर्म में ॐ का उच्चारण नहीं करना चाहिए, ऐसा शास्त्र में लिखा है । इस वर्ष पितृपक्ष में सब साधकों को ॐॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐॐ यह जपने के लिए कहा गया है । इसी प्रकार, श्राद्धकर्म के समय ॐ यह जप बजाना शास्त्रानुकूल होगा अथवा नहीं ?

उत्तर : जब श्राद्धकर्म हो रहा हो, तब ॐ का उच्चारण न करना उचित है । परंतु, जब जप मन में हो रहा हो, तब यह नियम नहीं लागू होता । श्राद्धकर्म आरंभ रहने पर, बताया हुआ नामजप ॐॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐॐ मन में करना उचित है, वैखरी वाणी (मुख से बोलते हुए) में नहीं । यदि जप मुख से ही करना हो, तब श्री गुरुदेव दत्त यह जप करें; परंतु इसे बजाएं नहीं ।

 

वेदमूर्ति केतन शहाणे, सनातन साधक-पुरोहित पाठशाला, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

 

Mysticpowernews

मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

Mysticpowernews has 574 posts and counting. See all posts by Mysticpowernews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *