श्री कृष्ण उपासना एवं उसका शास्त्रीय आधार

श्री कृष्ण उपासना एवं उसका शास्त्रीय आधार

१. श्री कृष्ण जन्माष्टमी की तिथि का महत्व

भगवान श्री कृष्ण पूर्णावतार हैं । उनकी श्रेष्ठता, कृतज्ञता शब्दों में व्यक्त करना हम जैसे सामान्य व्यक्तियों के लिए असंभव सी बात है । महाभारत, हरिवंश एवं भागवत अनुसार निश्चित की गई काल गणना के अनुसार, ईसा पूर्व ३१८५ वर्ष में, श्रावण कृष्ण अष्टमी की मध्य रात्रि, रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था । विक्रम संवत के अनुसार यह तिथि भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को आती है । इसलिए उत्तर भारत में श्री कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है । हिंदुस्थान के सभी वर्ण के लोग यह दिन बडे उत्साह के साथ  प्रेमपूर्वक मनाते हैं । इस तिथिका विशेष अध्यात्म शास्त्रीय महत्व है । इस दिन श्रीकृष्ण तत्व वातावरणमें अन्य दिनोंकी तुलनामें एक सहस्र गुना अधिक मात्रामें कार्यरत रहता है । इस कारण श्रद्धापूर्वक उपासना करनेवाले कृष्ण भक्तों को इस दिन भगवान श्रीकृष्णजी के अस्तित्त्व के संदर्भ में विविध अनुभूतियां होती हैं ।

२. श्री कृष्ण जन्माष्टमी मनाने की पद्धति

हिंदुस्थान में ही नहीं, संपूर्ण विश्व में श्री कृष्ण जन्माष्टमी अर्थात श्री कृष्ण जयंती अत्यंत धूमधाम से मनाई जाती है । श्री कृष्ण जन्माष्टमी  त्योहार,  व्रत  तथा उत्सव भी है ।

३ . श्री कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव

गोकुल, मथुरा, वृंदावन, द्वारका, पुरी ये सभी श्री कृष्ण की उपासना संबंधी पवित्र स्थल हैं, जहां यह उत्सव विशेष रूप से मनाते हैं । इन दिनों वृंदावन में आयोजित दोलोत्सव देखने योग्य होता है । अन्य क्षेत्रों में भी स्थान-स्थानपर श्रीकृष्ण जी के देवालयों में यह उत्सव मनाया जाता है । इस दिन कुछ लोग अपने घर में ही गोकुल-वृंदावन की झांकी बनाकर श्री कृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं । वैष्णव पंथीय यह दिन विशेष भक्ति भाव से मनाते हैं । अनेक वैष्णव देवालयों में दीपाराधना, शोभायात्रा, कृष्ण लीला, भागवत पाठ, कीर्तन, भजन, नृत्य-गायन इत्यादि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं । यह उत्सव श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से श्रावण कृष्ण अष्टमी तक मनाया जाता  है ।

४ . श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत

यह व्रत श्रावण कृष्ण अष्टमी को किया जाता है एवं दूसरे दिन अर्थात श्रावण कृष्ण नवमी के दिन पारण कर व्रत की समाप्ति होती है । यह व्रत सर्वमान्य है । यह व्रत बाल, युवा, वृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी कर सकते हैं । इस व्रत का फल है, पापनाश, सौख्यवृद्धि, संतति-संपत्ति एवं वैकुंठप्राप्ति ।

५ . श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत संबंधी उपवास

इस दिन दिनभर उपवास रखा जाता है । निराहार उपवास असंभव हो तो फलाहार कर सकते हैं । इससे एक दिन पूर्व अर्थात श्रावण कृष्ण सप्तमी को अंशमात्र भोजन करते हैं ।

६ . श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन की जाने वाली पूजा की विधि

श्री कृष्णजयंती के उपलक्ष्य में इस दिन श्री कृष्णकी विशेष पूजा अर्चना की जाती है । भगवान श्री कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि को हुआ था । इसलिए श्रीकृष्ण की विशेष पूजा अर्चना मध्य रात्रि को ही की जाती है । मध्य रात्रि को स्नान कर पूजा आरंभ की जाती है । कृपया ध्यान दें, ‘भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ है’, ऐसी धारणा से पूजा करनी चाहिए । एक दृश्यपट (Video) द्वारा भगवान श्री कृष्णजी की पूजा विधि देखते हैं ।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी  का श्रीकृष्ण की प्रतिमा का भावपूर्ण पूजन करने के सूक्ष्म-स्तरीय लाभ

८. पूजा का पूर्वायोजन

८ अ. पूजा के लिए चौकी पर एक आसन देकर भगवान श्री कृष्ण जी की प्रतिमा रखिए ।

८ आ. तदुपरांत श्री कृष्ण जी की प्रतिमा को चंदन तिलक लगाइए ।

८. इ. अब पुष्प अर्पण कीजिये ।

८ ई. यदि उपलब्ध हो तो कृष्ण को  कमल का पुष्प अर्पण कीजिए ।

८ उ. अब श्री कृष्ण जी को तुलसी अर्पण किजिए ।

८ ऊ. यदि उपलब्ध हो तो तुलसी की माला अर्पण कीजिए ।

८ ओ. अब धूप दिखाइए ।

८ औ. अब दीप दिखाइए ।

८ अं. अब दही पोहे का अर्थात दही चुडा का नैवेद्य निवेदित कीजिए ।

पूजा विधि के उपरांत संभव हो, तो भगवान श्री कृष्ण जी की अल्पतम तीन अथवा तीन गुणा की संख्या में परिक्रमा कीजिए । परिक्रमा करना संभव न हो, तो अपने चारों ओर तीन बार घूमकर परिक्रमा लगाइए ।

८ क. उसके उपरांत शरणागत भाव से नमस्कार करते हुए प्रार्थना कीजिए ।

८ ख. अंत में सबके साथ प्रसाद ग्रहण कीजिए ।

यहां ध्यान रखने योग्य बिंदु यह है कि पूजा विधि में संप्रदाय, प्रदेश, रूढि इत्यादि के अनुसार कुछ भेद हो सकते हैं ।

 

९. श्री कृष्ण की पूजा विधि में अंतर्भूत कृत्यों का शास्त्राधार

अ. श्री कृष्ण पूजन करने से पूर्व स्वयं को मध्यमा से भू्मध्य पर आज्ञा-चक्र के स्थान पर विष्णु समान दो खडी रेखाओं वाला तिलक लगाने का शास्त्रीय आधार

श्री कृष्ण पूजन से पूर्व दो खडी रेखाओं वाला तिलक लगाया जाता है । यह तिलक विशेषकर वैष्णव अर्थात भगवान श्री विष्णु के उपासक लगाते हैं । श्री कृष्ण पूजन से पूर्व उपासक श्री विष्णु तत्व से संबंधित खडा भरा हुआ तिलक भी लगा सकते हैं । सामान्यतः श्री कृष्ण पूजन में गोपी चंदन का उपयोग किया जाता है । इसे `विष्णुचंदन’ भी कहते हैं । यह द्वारका के क्षेत्र में पाई जाने वाली एक विशेष प्रकार की श्वेत मिट्टी है । जैसे गंगा में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं, उसी प्रकार गोपीचंदन का लेप लगाने से सर्व पाप नष्ट होते हैं । विष्णु गायत्री का उच्चारण करते हुए मस्तक पर गोपीचंदन लगाने की प्रथा है ।

श्री कृष्ण की उपासना

श्री कृष्ण यादवों के सात्वत कुल के थे । श्री कृष्ण के देहत्याग उपरांत सात्वतों ने उनकी उपासना आरंभ की । यह एक प्रकार से भक्ति मार्ग का आरंभ ही था । तमिलनाडु के आळवार संतों ने दक्षिण में श्री कृष्ण भक्ति को प्रचलित किया । महाभारत के काल में श्री कृष्ण की उपासना को ‘पांचरात्र’ कहते थे । इस मार्ग का संबंध भक्तिमार्ग की अपेक्षा तंत्रविद्या से अधिक था । अब यह मार्ग लगभग लुप्त ही हो गया है ।

सुन्दर कुमार ( प्रधान संपादक )

स्रोत : हिन्दू जन जागृति 

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