श्री राम की जन-जन में स्वीकार्यता


नमन कृष्ण भागवत किंकर


सहस्रों वर्षों से श्रीराम की जन-जन में स्वीकार्यता और वो भी ऐसी स्वीकार्यता जो किसी अन्य को नहीं मिली।
इस स्वीकार्यता के केन्द्र में है श्रीराम का नायकत्व।
ऐसा नेतृत्व जो वनवास के प्रथम चरण से शुरू हुआ और लंका विजय के बाद रामराज्य जैसी सर्वकालिक श्रेष्ठ परिकल्पना को साकार करने में परिलक्षित हुआ।
वनवास के प्रथम चरण में श्रीराम ने प्रथम भयवृत्ति की समाप्ति और दूसरा सामाजिक विषमता का अंत किया।
निषादराज गुह्म में इतना साहस नहीं था कि वे श्रीराम के समक्ष बैठ पाते और न ही केवट में इतना साहस था कि वो श्रीराम के चरण स्पर्श कर अपनी अस्पृश्यता का कलंक धो डालता। दोनों का भय था कि कहीं सामाजिक अथवा मर्यादा के विरुद्ध आचरण न मान लिया जाय। तब प्रभु श्री राम ने सबसे पहले उनके भय का निवारण किया। गुह्म वनराज है और उसे मित्रवत व्यवहार दिया और केवट को स्नेह देकर, नाव मंगाकर वार्तालाप का अवसर दिया। जैसे ही केवट निर्भय हुआ तो उसके मन में संशय हुआ कि क्या श्रीराम भी समाज में प्रचलित भेदभाव को प्रश्रय देंगे? श्रीराम ने पहला कार्य अस्पृश्यता का निवारण का किया, राजवंश और साधारण प्रजा के बीच विषमता की खाई को पाट दिया।
विषमता समाप्त होते ही केवट ने कहा-
“नाथ आजु मैं काह न पावा।
मिटे दोष दुख दारिद दावा।।
अर्थात सामाजिक विषमता मिटते ही समाज के भौतिक दुःख, दरिद्रता, दोष भी समाप्त हुए जो रामराज्य का वैशिष्ट्य है जिसने राम को महानायक के रूप में स्थापित किया।
दूसरा सत्य ये भी है कि विश्व का कोई भी समाज हो, बिना नायक के नहीं रह सकता। समाज को उसका नायक चाहिए ही चाहिए। राम का नायकत्व वनवास में पुष्ट हुआ। जहाँ वे अस्पृश्यता का शमन करके सामाजिक विषमता को मिटाकर राजमहल को जन सामान्य के बीच ले आते हैं वहीं वैदिक धर्माचरण के श्रेष्ठ मूल्यों की स्थापना भी करते चलते हैं। जहाँ एक तरफ माँ, पिता, बंधु-बांधव, प्रजा आदि के प्रति अपने धर्म का पालन करते हैं वहीं गुरू, योगी-यति संन्यासियों और वैदिक यज्ञ-कर्मकांड की रक्षा भी करते हैं। ये राज तन्त्र, सामाजिक तन्त्र और धर्मतन्त्र के शुभ समन्वय का अद्भुत दृष्टांत है।
अन्त में सबसे महत्वपूर्ण बात जिसने राम को जनमानस में स्थापित किया वो है अपनी पत्नी सीताजी के खोज की यात्रा। स्त्री निश्चित ही समाज की धूरी है। रामराज से पूर्व ये धूरी खंडित दिखाई देती है। वैदिक युग के बाद सतयुग समाप्त होते-होते निश्चित ही समाज में स्त्री का वो पद-सम्मान नहीं रहा होगा जो वैदिक या परवर्ती वैदिक काल या उत्तर वैदिक काल तक था। प्रमाण के तौर पर सीताहरण तो है ही, बाली द्वारा अपने अनुज सुग्रीव की पत्नी रोमा का बलात् भोग करना और यहाँ तक कि रावण द्वारा अनेक स्त्रियों का हरण।
तो पत्नी के हरण के बाद उनकी खोज में श्रीराम द्वारा समस्त शक्ति संचय का उपयोग और हठ से भी ज्यादा समर्पण जिसने स्त्री को समाज में पुनः सम्मान के साथ स्थापित किया, महत्वपूर्ण कारण था। यही राम के जन-जन में स्थापित होने के महत्वपूर्ण कारण बने।
“त्यक्त्वा सुदुस्त्यज सुरेप्सित राज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसायदगादरण्यम् ।मायामृगंदयितयेप्सितमन्वधावद् वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्।।”
..त्याग ,धर्म और प्रेम की पराकाष्ठा की प्रतिमूर्ति ,करुणानिधि श्री राम के चरणारविन्द में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।
लेख बहुत शीघ्रता में लिखा गया है, वैसे भी मुझे लिखने से अधिक सहजता बोलने में रहती है क्योंकि 15 वर्षों से बोल ही रहा हूँ।
जय सियाराम।
जय जय श्री राम कथा।
विशेष_आग्रह :- आज इस पोस्ट को प्रेषित करने का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
महान सनातन हिंदू धर्म में जन्म लेने का हमारा सौभाग्य पूरे विश्व में सबसे अधिक अनुपम है। और पिछले लगभग 493 वर्षों में सबसे भाग्यशाली पीढ़ी बनने का अवसर भी हमें मिला कि हमें हमारे परम आराध्य प्रभु श्रीरामलला मंदिर के खंडित जीर्णावशेष को पुनः विशाल मंदिर में निर्मित करने का सौभाग्य मिला है और हम प्रभु श्रीरामलला के मंदिर निर्माण के साक्षी होने जा रहे हैं। मंदिर निर्माण के लिए रामलला ट्रस्ट ने बहुत ही सुंदर निर्णय लिया है कि, प्रभु श्रीराम जी का मंदिर सरकारी सहायता के बिना प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्तों के गिलहरी अंशदान से ही निर्माण होगा। तो जो हमें साक्षी होने का सौभाग्य मिला है उसे हम यथाशक्ति अंशदान से सहभागी होने के दिव्य भाव में रूपान्तरित कर सकते हैं। इसके लिए रामलला मंदिर न्यास ने भगवान सूर्यनारायण के उत्तरायण होने के दिन 15 जनवरी 2021 से श्री राम मंदिर निर्माण हेतु निधि संग्रह अभियान प्रारंभ करने का निर्णय लिया है। न्यास द्वारा देशभर के सभी सनातनी हिंदू परिवारों को अयोध्या श्रीराम मंदिर से जोड़ने की यह यात्रा है जिसमें हम अपनी शक्ति, सामर्थ्यानुसार अंशदान दे सकते हैं। एक बार प्रभु श्रीराम अपने राजभवन को त्यागकर वनवास के बहाने मात्र जनमानस से सम्बन्ध स्थापित करने निकले थे। चौदह वर्षों तक प्रभु अपनी मैत्री, करुणा, वात्सल्य, प्रेम, आश्रय का दान आर्यावर्त्त के ग्रामीण, वन, अरण्य अंचलों तक लेकर गए और अपनी प्रजा के साथ निकट सम्बन्ध स्थापित किए। आज हम सबका दायित्व है कि उन्हीं करुणानिधान भगवान के घर-आंगन-मंदिर का पुनर्निर्माण हम करें और दायित्व यह भी है कि, राममंदिर निर्माण में अपना अंशदान देकर अपने उन पूर्वजों के प्रति हम श्रद्धांजलि अर्पित करें जिन्होंने प्रभु श्रीराम के जन्मस्थान के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, कई-कई बलिदान दिए। आपके घरों तक निधि संग्रह कमेटी के लोग स्वयं आएंगे तो संकल्प लें कि मंदिर निर्माण के लिए यथाशक्ति अंशदान देंगे।
जय श्री राम। जय जय श्री राम।

Mysticpowernews

मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

Mysticpowernews has 574 posts and counting. See all posts by Mysticpowernews