सनातन धर्म की एक अनमोल देन ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ !

 सनातन धर्म की एक अनमोल देन ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ !

१. गुरु पूर्णिमा

महाराष्ट्र के महान संत गुलाबराव महाराजजी से किसी पश्चिमी व्यक्तिने पूछा, ‘भारतकी ऐसी कौनसी विशेषता है, जो न्यूनतम शब्दोंमें बताई जा सकती है ?’ तब महाराजजीने कहा, ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ । इससे हमें इस परंपराका महत्त्व समझमें आता है । ऐसी परंपराके दर्शन करवानेवाला पर्व युग-युगसे मनाया जा रहा है, तथा वह है, गुरुपूर्णिमा ! हमारे जीवनमें गुरुका क्या स्थान है, गुरुपूर्णिमा हमें इसका स्पष्ट पाठ पढाती है ।

 

२. गुरु का महत्त्व

गुरुदेव वे हैं, जो साधना बताते हैं, साधना करवाते हैं एवं आनंदकी अनुभूति प्रदान करते हैं । गुरुका ध्यान शिष्यके भौतिक सुखकी ओर नहीं, अपितु केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नतिपर होता है । गुरु ही शिष्यको साधना करनेके लिए प्रेरित करते हैं, चरण दर चरण साधना करवाते हैं, साधनामें उत्पन्न होनेवाली बाधाओंको दूर करते हैं, साधनामें टिकाए रखते हैं एवं पूर्णत्वकी ओर ले जाते हैं । गुरुके संकल्पके बिना इतना बडा एवं कठिन शिवधनुष उठा पाना असंभव है । इसके विपरीत गुरुकी प्राप्ति हो जाए, तो यह कर पाना सुलभ हो जाता है । श्री गुरुगीतामें ‘गुरु’ संज्ञाकी उत्पत्तिका वर्णन इस प्रकार किया गया है,

 

गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते ।

अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ।। – श्री गुरुगीता

 

अर्थ : ‘गु’ अर्थात अंधकार अथवा अज्ञान एवं ‘रु’ अर्थात तेज, प्रकाश अथवा ज्ञान । इस बातमें कोई संदेह नहीं कि गुरु ही ब्रह्म हैं जो अज्ञानके अंधकारको दूर करते हैं । इससे ज्ञात होगा कि साधकके जीवनमें गुरुका महत्त्व अनन्य है । इसलिए गुरुप्राप्ति ही साधकका प्रथम ध्येय है । गुरुप्राप्तिसे ही ईश्वरप्राप्ति होती है अथवा यूं कहें कि गुरुप्राप्ति होना ही ईश्वरप्राप्ति है, ईश्वरप्राप्ति अर्थात मोक्षप्राप्ति- मोक्षप्राप्ति अर्थात निरंतर आनंदावस्था । गुरु हमें इस अवस्थातक पहुंचाते हैं । शिष्यको जीवनमुक्त करनेवाले गुरुके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए गुरुपूर्णिमा मनाई जाती है ।

३. गुरु पूर्णिमा दिन विशेष

आषाढ शुक्ल पूर्णिमाको गुरुपूर्णिमा एवं व्यासपूर्णिमा कहते हैं । गुरुपूर्णिमा गुरुपूजनका दिन है । गुरुपूर्णिमाका एक अनोखा महत्त्व भी है । अन्य दिनोंकी तुलनामें इस तिथिपर गुरुतत्त्व सहस्र गुना कार्यरत रहता है । इसलिए इस दिन किसी भी व्यक्तिद्वारा जो कुछ भी अपनी साधनाके रूपमें किया जाता है, उसका फल भी उसे सहस्र गुना अधिक प्राप्त होता है ।

४. गुरु पूर्णिमा का अध्यात्म शास्त्रीय महत्त्व

इस दिन गुरुस्मरण करनेपर शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होने में सहायता होती है । इस दिन गुरु का तारक चैतन्य वायुमंडलमें कार्यरत रहता है । गुरुपूजन करने वाले जीव को इस चैतन्य का लाभ मिलता है । गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं, गुरु पूर्णिमा पर सर्वप्रथम व्यास पूजन किया जाता है ।

एक वचन है – व्यासोच्छिष्टम् जगत् सर्वंम् । इसका अर्थ है, विश्वका ऐसा कोई विषय नहीं, जो महर्षि व्यासजीका उच्छिष्ट अथवा जूठन नहीं है अर्थात कोई भी विषय महर्षि व्यासजीद्वारा अनछुआ नहीं है । महर्षि व्यासजीने चार वेदोंका वर्गीकरण किया । उन्होंने अठारह पुराण, महाभारत इत्यादि ग्रंथोंकी रचना की है । महर्षि व्यासजीके कारण ही समस्त ज्ञान सर्वप्रथम हमतक पहुंच पाया । इसीलिए महर्षि व्यासजीको ‘आदिगुरु’ कहा जाता है । ऐसी मान्यता है कि उन्हींसे गुरु-परंपरा आरंभ हुई । आद्यशंकराचार्यजीको भी महर्षि व्यासजीका अवतार मानते हैं ।

 

५. गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाने की पद्धति

सर्व संप्रदायों में गुरुपूर्णिमा उत्सव मनाया जाता है । यहांपर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गुरु एक तत्त्व हैं । गुरु देह से भले ही भिन्न-भिन्न दिखाई देते हों; परंतु गुरु तत्त्व तो एक ही है । संप्रदायोंके साथही विविध संगठन तथा पाठशालाओंमें भी गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है ।

गुरु पूजनके लिए चौकी को पूर्व-पश्चिम दिशा में रखिए । जहां तक संभव हो, उसके लिए मेहराब अर्थात लघुमंडप बनाने के लिए केले के खंभे अथवा केले के पत्तों का प्रयोग कीजिए । गुरु की प्रतिमा की स्थापना करने हेतु लकडी से बने पूजाघर अथवा चौकी का उपयोग कीजिए । थर्माकोल का लघुमंडप न बनाइए । थर्माकोल सात्त्विक स्पंदन प्रक्षेपित नहीं करता । पूजन करते समय ऐसा भाव रखिए कि हमारे समक्ष प्रत्यक्ष सदगुरु विराजमान हैं । सर्वप्रथम श्री महागणपति का आवाहन कर देश काल कथन किया जाता है । श्रीमहागणपतिका पूजन करने के साथ-साथ विष्णु स्मरण किया जाता है । उसके उपरांत सदगुरु का अर्थात महर्षि व्यास जी का पूजन किया जाता है । उसके उपरांत आद्य शंकराचार्य इत्यादिका स्मरण कर अपने-अपने संप्रदायानुसार अपने गुरु के गुरु का पूजन किया जाता है । यहां पर प्रतिमा पूजन अथवा पादुका पूजन भी होता है । उसके उपरांत अपने गुरु का पूजन किया जाता है । इस दिन गुरु अपने गुरु का पूजन करते हैं ।

नितिन श्रीवास्तव ( सलाहकार संपादक )

संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’

 

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