समझिए नायक और अभिनेता में अन्तर

जनार्दन पाण्डेय प्रचंड-जया बच्चन के वक्तव्य पर हंगामा मचा हुआ है। होना भी चाहिए, पर क्या इन्हे चार गाली दे देने या हंगामा कर देने से समस्या का हल निकल आएगा। नहीं …आइए समस्या के मूल को पहचानने का प्रयास करते हैं। एक बार मूल मिल गया तो चाणक्य नीति के अनुरूप जड़ पर मट्ठा डालिए।
फिल्मों की तकनीक भले ही पिछले सौ वर्षो की देन हो पर अभिनय कला बहुत प्राचीन है। इतनी प्राचीन कि जब अरब वाले ऊंट पर चढना भी नहीं सीख पाए थे हमारे भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र की रचना कर दी थी।
कोई भी थोडा बहुत पढ़ा-लिखा व्यक्ति तमाम प्राचीन योद्धावों, कविओं, गणितज्ञों,आचार्यों और विज्ञानियों के दो-चार नाम बड़ी आसानी से गिना देगा। जिसे नहीं ज्ञात होगा वह ग्रंथों से खोज कर बता देगा। पर किसी से रामायण कालीन, महाभारत कालीन, गुप्त कालीन प्रसिद्ध अभिनेता का नाम पूछिए, वह किसी भी हाल में नहीं बता पाएगा। अधिक पीछे की छोड़िए, शिवाजी यह मंगल पांडेय जी के समय के किसी अभिनेता या रंगकर्मी का नाम कहीं नहीं मिलता।
कारण यह है कि अभिनेता किसी नायक के चरित्र को पटकथा के अनुसार प्रस्तुत करता है ना कि स्वयं नायक होता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने समाज के सच्चे नायकों को स्थापित किया, ना कि किसी नर्तक, नर्तकी या अभिनेता को। समाज में नायक स्थापित रहेंगे तो प्रेरणा पाकर नए नायक पैदा होते रहेंगे। अभिनय तो हो ही जाएगा। नायक को स्थापित करना मुख्य उद्देश्य होता था, अभिनय गौड़ होता था।
पिछले कई दशकों में मीडिया ने बड़े चालाकी से बालीवुड के नर्तकों को अभिनेता की जगह नायक और महानायक के रूप में स्थापित कर दिया। जब टीवी और रेडियो बार-बार चिल्ला-चिल्ला कर इनको नायक और महानायक बतायेंगे तो कोई भी सामान्य व्यक्ति इन्हें नायक मान ही लेगा, यह सामान्य मनोविज्ञान का खेल है। एफ. एम. चैनल इनके गंदे-भौंडे किस्सों को सामन्य ज्ञान के रूप में दिन-रात प्रस्तुत करते रहते हैं और युवा चटकारे लेकर इस ज्ञान को आत्मसात करता रहता है।
चूँकि नायक समाज का आदर्श होता है इसलिए जब नायक बदले तो आदर्श भी बदल गए। लड़के नायक की बजाय अभिनेता जैसा बनने का प्रयास करने लगे और लड़कियां अभिनेत्रियों की तरह। खोखले नर्तकों का समाज अनुसरण करेगा तो समाज खोखला होना ही है। उसी अनुसरण का नतीजा है आज की परिस्थितियां।
चाहे खान बन्धु हों, करण जौहर हों, बच्चन परिवार हो या बालीवुड में काम करने वाला कोई और नचनिया / विदूषक/अभिनेता हो, सब लगभग एक जैसे हैं। इन्हें इनकी असली भूमिका माने नचनिया/विदूषक/अभिनेता के रूप में देखा जाना चाहिए ना कि नायक, नायिका के रूप में। हमने दर्शक समूह के रूप में बन्दरों के हाँथ में उस्तरा थमा दिया है ।
यदि बन्दर के हाँथ में उस्तरा पकड़ा देंगे तो आप की दाड़ी-मूंछ का जो हाल होगा, वही हाल इन बंदरों द्वारा समाज का हो रहा है। नर्तक और गणिकाएं किसी भी जाग्रत समाज का आदर्श नहीं हो सकते। समाज के सच्चे नायकों को पहचानिए, उन्हे जीवंत कीजिए, उनका अनुसरण कीजिए। जया बच्चन के स्थान पर कोई सच्चा नायक राज्यसभा में पहुंचेगा जो आप की बात करेगा ।

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