समन्वय ज्ञान

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)

ज्ञान केवल समन्वय से होता है। यह ब्रह्म सूत्र के आरम्भ में ही है, जिसे चतुःसूत्री कहा जाता है।
१-अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। = पहले विश्व के बारे में जिज्ञासा होनी चाहिए। उत्सुकता शान्त होने पर आनन्द तथा मानसिक शान्ति मिलती है। पहले ही मान लें कि मैं गुरु तथा सर्वज्ञ हो चुका, तो अर्जित ज्ञान भी धीरे धीरे नष्ट होने लगता है। कुछ महापुरुषों से मेरा परिचय हुआ जिनमें ७५ वर्ष बाद चतुर्थ आश्रम में भी बाल सुलभ उत्सुकता तथा उत्साह बना रहता है। इससे उनकी मानसिक तथा शारीरिक शक्ति बनी रहती है।
२-जन्म्द्यस्य यतः= ब्रह्म की परिभाषा। जिससे इस संसार का जन्म आदि (विकास, वृद्धि, पालन, क्षय, नाशिक, लय) होता है। इसकी जिज्ञासा होने पर हर इच्छित विषय का ज्ञान होगा।
३-शास्त्र योनित्वात्-कई लोगों को लगता है कि केवल अपने चिन्तन से सम्पूर्ण ज्ञान हो जायेगा। परम्परा से सञ्चित ज्ञान शास्त्रों में है। उनको कुछ गुरु की सहायता से, कुछ अपने अध्यवसाय से सीखा जाता है।
४-तत् तु समन्वयात्-समन्वय से ही शास्त्र ज्ञान होता है। गीता में कहा है-संशयात्मा विनश्यति। यदि मन में परस्पर विरोधी विचार रहें, तो उनमें एक बाकी सबको नष्ट करता है। उससे सम्बन्धित अन्य तथ्य नहीं रहने पर वह ज्ञान भी नष्ट हो जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे Associative Memory कहते हैं। न्यायालय की भाषा में इसे Principle of Harmonious Construction कहते हैं (Interpretation of Statutes Act)।
शंकराचार्य ने इसे मन मे दो हंसो का वार्तालाप कहा है जिससे सभी १८ प्रकार की विद्या की परिणति होती है।
समुन्मीलत् संवित् कमल मकरन्दैक रसिकम्,
भजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानसिक चरम्।
यदालापादष्टादशगुणित विद्या परिणतिः,
यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव॥
(सौन्दर्य लहरी, ३८)
अन्तिम पंक्ति में नीर-क्षीर विवेक का उल्लेख है। यह लाक्षणिक है। वास्तव में कोई हंस दूध से पानी नहीं अलग कर सकता, वह दोनों को अलग अलग पहचान सकता है।
वेद के द्वा-सुपर्ण सूक्त का भी एक अर्थ यही है।
विपरीत शिक्षा-अंग्रेजी पद्धति में हर प्रकार से विपरीत शिक्षा दी गई जिससे भारत में कोई स्वतन्त्र विचारक नहीं हो।
विज्ञान, गणित या किसी भी अन्य विषय की किसी मान्यता को सत्य मान कर अनुसन्धान करते हैं तथा आवश्यक होने पर संशोधन करते हैं। पर भारतीय शास्त्रों के बारे में पहले ही मान लेते हैं कि वह झूठा है। कुछ लोग वेद भक्ति के नाम पर पुराण, तन्त्र, ज्योतिष आदि को झूठ मानते हैं। आगम-निगम-पुराण के समन्वय से ही पूर्ण ज्ञान होता है, जैसा रामचरितमानस के मंगलाचरण में लिखा है-नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद्।
प्रथम श्लोक मे विद्या के दो स्रोतों का भी समन्वय है-गणेश, सरस्वती। जिस की गणना हो सके, वह ज्ञान गणेश है। जिसे नहीं गिन सकें, वह भाववाचक संज्ञा है। उसका भाव या रस का अनुभव हो सकता है-रसवती इति सरस्वती। गणित भाषा में इनको discrete, continuous कहते हैं, या कम्प्यूटर भाषा में digital, analog।
दो सरल उदाहरण पर्याप्त हैं-इन्द्र को पूर्व का लोकपाल कहा गया है। अतः इन्द्र सम्बन्धित वैदिक शब्द ओड़िशा से इण्डोनेसिया तक, बर्मा (महा-अमर = ब्रह्मा), थाईलैंड आदि में मिलते हैं। रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४० में यवद्वीप सहित सप्त द्वीप में गरुड़ तथा इन्द्र का भवन कहा है। अतः वहां गरुड के शब्द भी हैं। कम्बोडिया के अंकुर-वट मन्दिर के निकट जिले का नाम भी वैनतेय है। अन्य क्षेत्रों के नाग भी उस दिशा के लोकपालों के अनुसार हैं। पर अंग्रेजों ने उलटा सिद्धान्त निकाला कि आर्य पश्चिम से आये थे तथा उनके मुख्य देवता इन्द्र थे। इसे प्रमाणित करने के लिए उन्होंने १९२० में दो नगरों की खुदाई करवाई जिनको जनमेजय ने ३०१४ ईपू में श्मशान बना दिया था (१९०० जनवरी में मैसूर ऐण्टीकुअरी में प्रकाशित ५ दानपत्र)। श्मशान बनने के बाद इन नाग नगरों का नाम हुआ-मोइन-जो दरो (मृतकों का स्थान), हडप्पा (हड्डियों का ढेर)। पर वहां के खिलौनों को लिपि मान कर आज तक की प्रकार से पढ़ कर मनमाने निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं।
पिछले ५००० वर्षों से भागवत माहात्म्य से भागवत प्रवचन आरम्भ होता है कि ज्ञान तथा वैराग्य का जन्म द्रविड में हुआ, कर्णाटक में वृद्धि हुई तथा महाराष्ट्र तक विस्तार हुआ। इन क्षेत्रों के नाम भी इसी पर आधारित हैं। अप् या द्रव से सृष्टि हुई, ज्ञान आरम्भ का क्षेत्र द्रविड हुआ। इसका ग्रहण कर्ण आदि ज्ञानेन्द्रियों से होता है, अतः जहां वृद्धि हुई (आधिभौतिक अर्थ का अध्यात्म तथा अधिदैव में विस्तार), वह कर्णाटक हुआ। जहां तक प्रसार (महर् = महल) वह महाराष्ट्र हुआ। नहीं तो भारत महाराष्ट्र होता, और वह राष्ट्र। भागवत माहात्म्य कहते ही एक प्रवचन कर्ता ने कहा कि उत्तर के आर्यो ने दक्षिण के द्रविडों पर वेद थोप दिया। मुझे आश्चर्य हुआ तो ऋग्वेद का पहला सूक्त देखा। उसके दो शब्द दोषा-वस्ता (रात-दिन) केवल दक्षिण में प्रचलित हैं। यदि उत्तर के आर्य लाते तो इनका प्रयोग पंजाब, राजस्थान में भी होता।
वेद में पत्नी के ४ रूपों के शब्द प्राचीन भारत के पश्चिम भाग अरब में ही मिलते हैं, जहां इसका अर्थ किया कि ४ पत्नी तक रख सकते हैं। पाला-गली = दो पाला के बीच गली (पिता तथा पति के परिवार के बीच सूत्र)। इसी अर्थ में तोता भी कहा है-तोता की तरह बोलने वाली। ववाता = परिवार की मालकिन (प्राचीन अरबी, वर्तमान केन्या में प्रचलित)।
अन्तर्विरोधी शोध-
(१) एक शोध पत्र में लिखा कि ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में सामवेद का ३० बार उल्लेख है। उसके बाद लिखा कि ऋग्वेद प्रथम था, उसके बाद यजु, सामवेद हूए।
(२) प्रायः ३० शोधपत्र हैं कि महाभारत में पाणिनि पूर्व के कई प्रयोग हैं, जिनकी व्याख्या पाणिनि सूत्रों से नहीं हो सकती। एक है काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से स्वामी रामभद्राचार्य का शोधपत्र। अतः पाणिनि महाभारत के बहुत बाद के हैं। पाणिनि ने महाभारत के पूर्व के वैदिक शब्दों के लिए वैदिकी प्रक्रिया के भी सूत्र लिखे हैं। वह भविष्य के शब्दों की व्याख्या नहीं कर सकते थे। यदि महाभारत के प्रयोग उनके अनुसार नहीं हैं, तो वे महाभारत पूर्व के होंगे।

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