सरस्वती का ओङ्कार पञ्जर स्तोत्र

अरुण कुमार उपाध्याय धर्मज्ञ)

यह तृतीय कालिदास की रचना है, जो संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य की १० पीढ़ी बाद के भोजराज के आश्रित थे। ये भोजराज पैगंबर मुहम्मद के समकालीन थे, जिनसे बल्ख अभियान में पैगंबर ने सहायता मांगी थी। चिद्गगन चन्द्रिका के अनुसार यह महाराष्ट्र के पूर्णा के थे तथा पूर्णा इनकी कुलदेवी थीं। प्रथम कालिदास नाटककार थे जो मालविकाग्निमित्रम् के भरतवाक्य अनुसार अग्निमित्र के समकालीन थे। द्वितीय महाकवि कालिदास विक्रमादित्य के आश्रित थे जैसा ज्योतिर्विदाभरण के अध्याय २० में लिखा है। उसके अनुसार इसके पूर्व इन्होंने ३ महाकाव्य लिखे। उन महाकाव्यों में कवि का नाम कहीं नहीं है। ज्योतिर्विदाभरण से ही इसका पता चलता है।
सरस्वती वन्दना-ॐकार पञ्जर स्तोत्र
राग-मालिका. आदि ताल।
(रागा: मध्यमावति)
ओङ्कार पन्जर शुकीम्-उपनिषद्-उद्यान केलि कलकण्ठीम्।
आगम विपिन मयूरी-मार्यामन्तर्-विभावये गौरीम्॥१॥
अर्थ- ॐकार पिंजड़ा है जिसमें सरस्वती सुग्गी के समान हैं। उपनिषद् रूपी उद्यान की कोयल हैं तथा आगम (तन्त्र, वेद भी-परम्परा से प्राप्त साहित्य) रूपी विपिन (वन) की मयूरी हैं। उनका ध्यान भीतर में गौरी के रूप में करता हूं।
टिप्पणी-वाणी के ४ पद हैं जिनमें ३ गुहा में हैं तथा चतुर्थ पद कथन या लेखन में निकलता है। भीतर के ३ पद गौरी (ग= तीसरा व्यञ्जन) हैं-परा, पश्यन्ती, मध्यमा। बाहर व्यक्त या वैखरी वाणी में कुछ लुप्त हो जाता है अतः उसे तम कहते हैं। गौ तथा तम का सम्बन्ध गौतम का न्याय दर्शन है।
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥ (ऋग्वेद १/१६४/४५)
परायामङ्कुरीभूय पश्यन्त्यां द्विदलीकृता ॥१८॥
मध्यमायां मुकुलिता वैखर्या विकसीकृता॥ (योगकुण्डली उपनिषद् ३/१८, १९)
अक्षरं परमो नादः शब्दब्रह्मेति कथ्यते। मूलाधारगता शक्तिः स्वाधारा बिन्दुरूपिणी॥२॥
तस्यामुत्पद्यते नादः सूक्ष्मबीजादिवाङ्कुरः। तां पश्यन्तीं विदुर्विश्वं यया पश्यन्ति योगिनः॥३॥
हृदये व्यज्यते घोषो गर्जत्पर्जन्यसंनिभः। तत्र स्थिता सुरेशान मध्यमेत्यभिधीयते॥४॥
प्राणेन च स्वराख्येन प्रथिता वैखरी पुनः। शाखापल्लवरूपेण ताल्वादिस्थानघट्टनात्॥५॥ (योगशिखोपनिषद् ३/२-५)
(राग-आनन्दभैरवि)
दयमान दीर्घ नयनाम् देशिक रूपेण दर्शिताभ्युदयाम्।
वामकुच निहित वीणाम् वरदाम् संगीत मातृकाम् वन्दे॥२॥
अर्थ-सरस्वती दया-युक्त हैं, दीर्घ नयन वाली हैं। दैशिक (या देशिक, जो दिशा दिखाये, गुरु) रूप में अभ्युदय का मार्ग दिखाया है। वाम स्तन पर वीणा है तथा सभी संगीत की मातृका (वर्णमाला) हैं।
टिप्पणी-अभ्युदय = धर्ममार्ग, निःश्रेयस = मोक्ष। मीमांसा दर्शन के आरम्भ में धर्म की परिभाषा है-कि इससे अभ्युदय और निश्श्रेयस होता है। अथ धर्मानुशासनम्।१। यतोऽभ्युदय निःश्रेयसः॥२॥
वर्णों से सभी प्रकार के शब्द-वाक्य आदि से युक्त साहित्य बनते हैं, अतः इसे मातृका (माता समान) कहा गया है।
(राग-काम्भोजि)
श्याम तनु सौकुमार्याम् सौन्दर्यानन्द सम्पदुन्मेषाम्।
तरुणिम करुणापुराम् मदजल कल्लोल लोचनाम् वन्दे॥३॥
अर्थ-सरस्वती का श्याम तनु सुकुमार (कोमल) है, सौन्दर्य आनन्द की सम्पत्ति का उन्मेष (आरम्भ) है। तरुणी तथा करुणा का पुर (नगर, रचना) हैं। मद जल के कल्लोल (तरङ्ग) जैसे चञ्चल नेत्र हैं। ऐसी सरस्वती की वन्दन करता हूँ।
टिप्पणी-सरस्वती को प्रायः शुक्ल कहा जात है। यहां उनको श्याम तनु कहा गया है। प्रथम श्लोक की टिप्पणी में कहा है कि गुहा के भीतर वाणी के ३ पद गो या गौरी वाक् हैं। बाहर व्यक्त होने वाली वाणी में कुछ लुप्त हो जाता है, अतः उसे तम कहते हैं। यही तम को श्याम तनु कहा गया है।
चण्डी पाठ के भी महासरस्वती चरित्र के आरम्भ के अध्याय ५ के ध्यान में कह है-गौरी देह समुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा, पूर्वामत्र सरस्वतीं अनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
इसी अध्याय में कहा है कि शरीर कोष रूपी देवी गौरी हैं, उससे अलग देवी कालिका (कृष्णा) हैं। अर्थात् मस्तिष्क गुहा (शरीर कोष) की वाणी गौरी हैं।
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका। कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते॥८७॥
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती। कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥८८॥
(राग-कल्याणि)
नख मुख मुखरित वीणानाद रसास्वाद नव नवोल्लासम्।
मुखमम्ब मोदयतु माम् मुक्ता ताटङ्क मुग्ध हसितम् ते॥४॥
अर्थ-नख तथा मुख से मुखरित वीणा नाद के रस स्वाद से नया नया उल्लास होता है। नख से वीणा के तार बजते हैं, मुख से वैसे ही राग की ध्वनि निकलती है। हे माता! आपकी मोहक हास्य तथा चञ्चल (मुक्त) ताटङ्क से मुझे आनन्द मिले।
(राग-मायामालवगौड़)
सरिगम पद निरताम् ताम् वीणा सन्क्रान्त कान्त हस्ताम् ताम्।
शान्ताम् मृदुल स्वान्ताम् कुचभारनतान्ताम् नमामि शिवकान्ताम्॥५॥
अर्थ-सरिगम (संगीत स्वर) के पद में निरत हैं, हाथों में वीणा से स्वर निकल रहे हैं। बाहर ध्वनि निकल रही है, किन्तु भीतर से शान्त और मृदुल हैं। ऐसी शिवकान्ता (शिव पत्नी) को नमस्कार है जिनका शरीर स्तन के भार से थोड़ा झुका हुआ है।
टिप्पणी-संगीत के स्वर हैं-षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद। इनमें प्रथम ४ स्वरों के प्रथम अक्षरों से सरिगम या सरगम बना है।
(राग-मोहन)
अवटुतट घटितचूली ताडित ताली पलाश ताटङ्काम्।
वीणा वादन वेला कम्पित शिरसम् नमामि मातङ्गीम्॥६॥
अर्थ्-वटु (छात्र) को सरस्वती के पास जाने पर और किसी तट (आश्रय) की जरूरत नहीं होती। वह चूली (चूल = चोटी) अर्थात् शिखर पर पहुंच जाता है। ताली (ताल =संगीत का स्वर) अर्थात् संगीत शिक्षा की मूल हैं। पलास (वेद) रूपी ताटङ्क (कान का कुण्डल) है। मातङ्ग (१० वीं महाविद्या, रामायण काल के एक ऋषि की कन्या रूप में) की कन्या रूप में हैं।
टिप्पणी-वट वृक्ष गुरु शिष्य परम्परा का प्रतीक है अतः वह आदि गुरु शिव का चिह्न है। जैसे वट वृक्ष की शाखा जमीन से लग कर उसी के जैसा वृक्ष बन जाती है, उसी प्रकार गुरु शिष्य को अपना ज्ञान देकर अपने जैसा बना देता है। (दक्षिणामूर्ति स्तोत्र का अन्तिम श्लोक)। अतः शिष्य को वटु कहते हैं। वट के मूल द्रुम से जो अन्य द्रुम निकलते हैं, उनको दुमदुमा कहते हैं-सोमनाथ में दुमियाणी, भुवनेश्वर में दुमदुमा, कोलकाता के दक्षिणेश्वर के निकट दुमदुमा (दमदम हवाई अड्डा), कामाख्या के निकट दुमदुमा (बंगलादेश सीमा पर), वैद्यनाथ धाम का दुमका।
मुण्डकोपनिषद् के अनुसार मूल अथर्व वेद से ३ अन्य शाखायें निकलीं-ऋक्, यजु;, साम, जैसे पलास की टहनी से ३ पत्ते निकलते हैं (फिर वही ढाक के ३ पात)। अतः पलास ब्रह्मा या वेद का चिह्न है। शाखा निकलने से मूल नष्ट नहीं होता, अतः त्रयी का अर्थ ४ वेद होते हैं, १ मूल + ३ शाखा।
मतङ्ग का अर्थ हाथी भी होता है। व्यक्त वैखरी वाणी स्थूल है अतः उसे मतङ्ग भी कहते हैं। वह सुनने पर शुद्ध अर्थ सरस्वती की कृपा से ज्ञात होता है।
(राग-भैरवि)
वीणा रवानुषङ्गम् विकच मदामोद माधुरी भृङ्गम्।
करुणा पूरतरङ्गम् कलये मातङ्ग कन्यकापाङ्गम्॥७॥
अर्थ-वीणा रव (ध्वनि) के साथ हैं। अर्थों के मूल में पहुंचने वाली (वि-कच = बिना केश का, बाल की खाल निकालना)। शास्त्र-माधुरी का आनन्द लेने वाली भृङ्ग (भ्रमर) हैं। वह करुणा की तरङ्ग से भरी तथा उससे विचलित (कलये) हैं। मातंग मुनि की कन्या रूप में अपाङ्ग (तिरछे नेत्र वाली हैं)।
(राग-सिंहेन्द्रमध्यम)
मणि भङ्ग मेचकाङ्गीम् मातङ्गीम् नौमि सिद्ध मातङ्गीम्।
यौवन वन सारङ्गीम् संगीताम्भोरुहानुभव भृङ्गीम्॥८॥
अर्थ-मेचक (मयूर जैसा नील वर्ण) अङ्ग वाली, मणिबन्ध (कटि या करमूल) को झुकाये हुयी मातङ्गी है। ऐसी सिद्ध मातङ्गी को नमस्कार। वे यौवन वन की हरिणी (सारङ्गी) हैं तथा संगीत रूपी कमल की भ्रमर हैं।
(राग-सुरटि)
मेचकमासेचनकम् मिथ्या दृष्टान्त मध्य भागम् ते।
मातस्तव स्वरूपम् मङ्गल सङ्गीत सौरभम् वन्दे॥९॥
अर्थ-मनोहर श्याम शरीर वाली, मध्य कटि भाग के मिथ्या दृष्टान्त वाली माता को नमस्कार जो स्वयं संगीत सौरभ का मङ्गल रूप हैं।
टिप्पणी-सरस्वती जगत् माता हैं। विशाल जगत् उनके मध्य भाग (उदर, कटि) से उत्पन्न हुआ है, जिसे बहुत सूक्ष्म कहा है। इतनी छोटी कटि से विशाल जगत् होना मिथ्या लगता है। पण्डितराज जगन्नाथ ने भी लक्ष्मी वन्दना में कहा है कि उनकी पतली कटि से जगत् की उत्पत्ति कही गयी है, इसी से विश्वास हुआ कि जगत् मिथ्या है (ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या)।
जगन्मिथ्याभूतं मम निगदतां वेदवचसाम्, अभिप्रायो नाद्यावधि हृदय मध्याविशदयम्।
इदानीं विश्वेशां जनकमुदरं ते विमृशतो, विसन्देहं लग्नेयं सुगतमतसिद्धान्तसरणिः॥
(लक्ष्मी लहरी, १८)
अर्थ-वेद में कहा है कि जगत् मिथ्या है। अभी तक मुझे इस पर विश्वास नहीं हुआ था। किन्तु पूरे विश्व के जनक रूप में गरुडध्वज की प्रियतमा का उदर देख कर सन्देह दूर हो गया। इतने छोटे उदर में विशाल विश्व कैसे हो सकता है?
माणिक्य वीणामुपलालयन्तीं मदालसां मञ्जुलवाग्विलासाम्।
माहेन्द्रनीलद्युतिकोमलाङ्गीं मातङ्गकन्यां सततं स्मरामि॥
अर्थ-माणिक्य की वीणा को गोद में रख कर बजा रही हैं (उपलालयन्तीम्)। मञ्जुल वाणी के विलास में मग्न या मदमस्त हैं। उनकी शोभा माहेन्द्र-नील है, तथा कोमल अंग हैं। ऐसी मातंग कन्या का मैं सतत् स्मरण करता हूं
टिप्पणी-सामान्यतः गौरी वाक् के रूप में सरस्वती को सदा गौरी कहा गया है। किन्तु व्यक्त वाणी तम है, अतः इस रूप में नील वर्ण का कहा गया है।
पूर्व तट का पर्वत महेन्द्र पर्वत है, ओडिशा के फूलबानी से आन्ध्र के राजमहेन्द्री तक। रामायण में रामेश्वरम तक महेन्द्र पर्वत कहा गया है। उसके निकट जगन्नाथ का स्थान नीलाचल कहलाता है। उनकी या कृष्ण की जैसी श्याम शोभा है, वैसी हई मातङ्गी रूप में सरस्वती की शोभा है।

Mysticpowernews

मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

Mysticpowernews has 574 posts and counting. See all posts by Mysticpowernews