सीता

श्री अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)

वाल्मीकि ने पौलस्त्यवध नामक काव्य सीता के महान् चरित का वर्णन करने के लिये लिखा था-
वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग ४-
काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्। पौलस्त्यवधमित्येव चकार चरितव्रतः॥७॥
भगवान् के अवतार का उद्देश्य दुष्टों का वध कर सज्जनों की रक्षा है, अतः अवतारी पुरुष की कथा पौलस्त्य वध है-
अरित्र्णाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता, ४/८)
परम तत्त्व के रूप में सीता-राम एक ही हैं, जो सृष्टि के लिये २ रूपों में दीखते हैं।
गिरा-अरथ जल वीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। वन्दौं सीताराम पद जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न॥
(रामचरितमानस, बालकाण्ड, १८/०)
इसी द्वैत मिलन को कालिदास ने वाक्-अर्थ (गिरा-अरथ) रूप में पार्वती-परमेश्वर कहा है-
वागर्थाविवसंपृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ॥ (रघुवंश, मंगलाचरण)
वाक् का अर्थ है वाणी (शब्द) या उसका विस्तार आकाश (अकाश का गुण शब्द है)। अर्थ उसका भौतिक रूप है जैसे अंग्रेजी में पृथ्वी को कहते हैं। तत्त्व रूप में विश्व या जगत् का अनुभव वेद-पुरुष है। उसका शब्दों के रूप में वर्णन वाक् है जो देवी स्वरूप है-
शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान-मुद्गीथ रम्य पद-पाठवतां च साम्नाम्।
देवी त्रयी भगवती भवभावनाय,
(भव या शिव को मोहित करने, या सृष्टि को जानने के लिये)
वार्ता च सर्वजगतां परमार्ति हन्त्री॥ (दुर्गा सप्तशती, ४/१०)
परम पुरुष रूप में राम अव्यक्त ब्रह्म हैं। सृष्टि के लिये सीता उनका प्रकृति रूप हैं। इसका वर्णन सीता जी ने हनुमान् से किया है जिसे रानहृदय कहते हैं (अध्यात्म रामायण, सर्ग १) इसका पूरा सारांश रामचरितमानस के मङ्गलाचरण में है-
उद्भव-स्थिति-संहार-कारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां, नतोऽहं रामवल्लभाम्॥५॥
यन्माया वशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा,
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जुर्यथाहेर्भ्रमः।
(असत् या कम सत्य विश्व मायाके कारण सत्य जैसा दीखता है, जैसे रज्जु सांप जैसा। अन्धकार में सांप रस्सी जैसा लग सकता है, पर चढ़ने के लिये उसे रस्सी जैसा काम नहीं ले सकते है जैसा तुलसीदास की लोकोक्ति में कहा गया है)
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां,
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥६॥
२८वें व्यास कृष्ण द्वैपायन (या बादरायण मुनि) ने वेदों को समझाने के लिये श्रीमद् भागवत पुराण की रचना की। इसके ४ उद्देश्य गरुड़ पुराण में वर्णित थे जिसको १७३० में ब्रह्मसूत्र के गोविन्द भाष्य के आरम्भ में बलदेव विद्याभूषण ने उद्धृत किया है-
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां, भारतार्थ विनिर्णयः।
गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ, वेदार्थ परिबृंहणम्॥
यह महत्त्वपूर्ण श्लोक था, अतः १७८० संस्करण में विलियम जोन्स ने इसे निकलवा दिया।
इसी प्रकार २४वें व्यास ऋक्ष या वाल्मीकि ने वेदों को समझाने के लिये रामायण लिखा-
वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना॥
(मन्त्र रामायण, १/१/१)
राम अश्वमेध के समय सीता को निष्कलङ्क कहते समय वाल्मीकि ने अपने को प्रचेता का १०म पुत्र (या १०म पुरुष = पीढ़ी कहा है)। अतः उनको प्राचेतस कहा है-
प्राचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन। न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ॥
(रामायण, उत्तरकाण्ड, ९६/१९)
यह पूरा अध्याय सीता जी की महत्ता का वर्णन करता है। कई लोग अपने को विद्वान् दिखाने के लिये रामायण का बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड क्षेपक मानते हैं। यदि राम न पैदा हुए न राजा बने तो रामायण क्यों लिखी गयी?
वाल्मीकि रामायण में भी लिखा है कि वेद समझाने के लिये लव कुश को रामायण पढ़ाया-
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः। (रामायण, १/४/६)
रामायण का मूल नाम पौलस्त्य (रावण) वध था, जो सीता का महान् चरित्र दिखाने के लिये था। पर यह रामायण इसलिये कहा गया कि राम अयोध्या से दक्षिण लंका तथा लंका से पुनः उत्तर अयोध्या लौटे। दक्षिण यात्रा कष्ट और तप के लिये थी, उत्तर यात्रा श्रेय के लिये रावण वध के बाद थी। सूर्य की भी पृथ्वी सतह पर जो गति दीखती है उसे अयन कहते हैं जो २ भाग में है-कर्क से मकर रेखा तक दक्षिणायन तथा मकर से कर्क तक उत्तरायण। दोनों अयन मिला कर हायन होता है। हायन उत्तरायण से आरम्भ होता है जो मार्गशीर्ष मास में होता है। यह हायन के अग्र में होने से अग्रहायण (अगहन) मास है।
वाल्मीकि रामायण के अतिरिक्त अध्यात्म रामायण (वह भी वाल्मीकि का है), आनन्द रामायण, अद्भुत् रामायण, महाभारत, पद्मपुराण, स्कन्द पुराण आदि में श्री राम का परमेश्वर रूप तथा श्री सीता का महाशक्ति या राम स्वरूप होना स्पष्ट रूप से वर्णित है।
भगवान् राम के अभिषेक के बाद रामायण की रचना हुई तथ् इसमें कुछ भविष्य की घटनायें भी वर्णित हैं।
प्राप्त राज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः। चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत्॥ (१/४/१)
अतीत घटनाओं का उल्लेख-
इक्ष्वाकु वंश प्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः। नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी॥ (१/१/८)
स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन्। (१/१/२४)
भविष्य के निर्देश-
न पुत्र मरणं केचिद् द्रक्ष्यन्ति मनुजाः क्वचित्। (१/१/९१)
चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति। (१/१/९६)
ब्रह्मा के आशीर्वाद से वाल्मीकि को ऋतम्भरा प्रज्ञा मिली जिससे उनकी कोई भी बात मिथ्या नहीं हुई और सभी रहस्य ज्ञात हो गये।
तच्चाप्यविदितं सर्व विदितं ते भविष्यति। न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति॥ (१/२/३४,३५)
रामायण में बहुत स्थानों पर राम के परमात्मा या विष्णु रूप का वर्णन है-(१/१५/१६, २१, २२; १/१८/१०,११; १/१९/१४, १५, १/४९/२१,२२; १/७६/१७-१९; २/१७/१३,१४; २/३७/३२; २/४०/२४; ३/३७/१३, ३/६४/५४-६२; ४/१५/१९-२१, ४/२४/३१; ५/५१/४४, ६/१८/२३,३३; ६/२८/१६-२०; ६/३५/३६; ६/३५/३६; आदि)।
सीता जी को भी पराशक्ति कहा है। स्वयं सीताजी ने कहा- मैं राघव से वैसे ही अभिन्न हूं, जैसे भास्कर से उसकी प्रभा। जैसे तपोनिष्ठ ब्राह्मण की विद्या अनपायिनी है, उसी प्रकार मैं श्रीराम की अनपायिनी शक्ति हूं।
अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा॥ (५/२१/१५)
अहमौपायिकी भार्या तस्यैव च धरापतेः। व्रतस्नातस्य विद्येव विप्रस्य विदितात्मनः॥१७॥
श्रीराम भी सीता की कीर्त्ति तथा अभिन्नता कहते हैं-सीता मुझसे वैसे ही अभिन्न हैं, जैसे भास्कर से प्रभा। जनकपुत्री तीनों लोकों में अत्यन्त विशुद्ध हैं। जैसे आत्मवान् प्राणी द्वारा कीर्ति का त्याग अशक्य है, वैसे ही सीता का त्याग भी अशक्य है।
अनन्या हि मया सीता भास्करेण प्रभा यथा॥ (६/१२१/१९)
विशुद्धात्रिषु लोकेषु मैथिली जनकात्मजा। न हि हातुमियं शक्या कीर्तिरात्मवता यथा॥२०॥
वेदों में सीता राम चर्चा-इक्ष्वाकु नाम ऋक् तथा अथर्व वेद में आया है-
यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान्मराय्येधते। दिवीव पञ्चकृष्टयः॥ (ऋक्, १०/६०/४)
पर यहां असमाति देव हैं तथा ५ प्रकार की कृषि उत्पाद का उल्लेख है।
यं त्वा वेद पूर्व इक्ष्वाको यं वा त्वा कुष्ठ काम्यः (अथर्व, १९/३९/९)
इसका देवता कुष्ठ है तथा उसकी चिकित्सा का कथन है।
एक स्थान पर दशरथ का उल्लेख है-
चत्वारिंशद् दशरथस्य शोणाः सहस्र्याग्रे श्रेणिं नयन्ति (ऋक्, १/१२६/४)
= दशरथ के लाल रंग के ४० घोड़े १००० घोड़ों का नेतृत्व करते हैं।
इसके पूर्व के मन्त्र में दश रथासो शब्द है- यहां अलग अलग १० रथों का उल्लेख है, किसी व्यक्ति का नहीं।
वेद में सीता स्वरूप-
इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिरक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरां समाम्॥
(ऋक्, ४/५७/७, अथर्व सं. ३/१७/४, कौशिक सूत्र, ७८/१०)
इन्द्र सीता को ग्रहण करें, पूषा सूर्य उसकी रखवाली करें और सीता पानी से भरी प्रत्येक वर्षा में धान्य प्रदान करती रहे।
सीता कृषि उत्पादन है जिसका भाग कर के रूप में राजा इन्द्र को मिलता है।
सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः॥
(ऋक्, ४/५७/६, अथर्व, ३/१७/८, तैत्तिरीय आरण्यक, ६/६/२, कौशिक सूत्र, २०/१०)
हे सीता! हम तुम्हारी वन्दना करते हैं, हे सौभाग्यवती! हमारी ओर अभिमुख हो, जिससे तू हमारे लिए सुन्दर फल देने वाली हो।
घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वेदेवैरनुमता मरुद्भिः। सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जवती घृतवत्पिन्वमाना॥
(ऋक्, ४/५७/९, अथर्व, ३/१७/९, वाजसनेयि सं. ३/३, शतपथ ब्राह्मण, ७/२/२/१०, तैत्तिरीय संहिता, ४/२/५/६, मैत्रायणी संहिता, २/७/१२, या ९२/७, काण्व संहिता, १६/१२, आपस्तम्ब श्रौत सूत्र, १६/२०/७)
घृत और म्धु से ओतप्रोत सीता विश्वेदेवताओं और मरुतों से अनुमोदित हो। हे सीते! ओजस्विनी और घी से सींची हुई तू पय (दूध) के साथ हमारे पास विद्यमान रहे।
पारस्कर गृह्य सूत्र में सीता यज्ञ का विस्तृत वर्णन है। खेत के उत्तर या पूर्व में पहले से जोते हुए शुद्ध स्थल पर या गांव में आग जला कर स्थालीपाक तैयार करते हैं। घृत की आहुति देने के समय इन्द्र, सीता एवं उर्वरा से प्रार्थना की जाती है-
यस्या भावे वैदिक लौकिकानां भूतिर्भवति कर्मणामिन्द्रपत्नीमुपह्वये सीतां सा मे त्वनपायिनी भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा॥ (पारस्कर गृह्य सूत्र, २/१७/४)
हे कामधेनु सीते! आप मित्र, वरुण, इन्द्र अश्विन, पूषण, प्रजा और ओषधियों का मनोरथ पूरा करें।
काठक गृह्य सूत्र के अनुसार खस आदि सुगन्धित घास से सीता कुमारी देवी की मूर्ति बनायी जाती है-
यत्र वीरणादिमयी सीता कुमारी देवता विरच्यते।
कौशिक सूत्र के१३वें अध्याय के अन्त में सीता की विस्तृत प्रार्थना की गयी है। यह सामग्री सामवेद के अद्भुत् ब्राह्मण से मिलती है। विलक्षण गतनाओं पर अपशकुन के निवारणार्थ दो हलों के उलझ जाने पर पुरोहित को पुरोडाश तैयार करके जंगल में पूर्व की ओर एक सीता खींचनी पड़ती थी। उसमें अग्नि जला कर आहुति देते समय प्रार्थना होती थी-
वित्तिरसि पुष्टिरसि प्राजापत्यानां त्वाहं मयि—।
इनमें सर्वाङ्गशोभिनी, हिरण्मयी माला धारण करने वाली, कालनेत्रा, श्यामा, हिरण्मयी पर्जन्य पत्नी सीता का मानवीकरण स्पष्ट है। महाभारत के द्रोण पर्व में शल्य के ध्वजाग्र में सीता का उल्लेख हुआ है। हरिवंश में भी-
मद्रराजस्य शल्यस्य ध्वजाग्रेऽग्निशिखामिव। सौवर्णीं प्रतिपश्यामः सीतामप्रतिमां शुभाम्॥
सा सीता भ्राजते तस्य रथमास्थाय मारिष। सर्वबीजविरूढेव यथा सीताश्र्या वृता॥ (महाभारत, ७/१०५/१८,१९)
कर्षकाणां च सीतेति भूतानां धारणीति च। (हरिवंश पुराण, २/३/१४)
कौशिक सूत्र में महालक्ष्मी रूपा सीता की स्तुति-
वित्तिरसि पुष्टिरसि प्राजापत्यानां त्वाहं मयि पुष्टिकामो जुहोसि स्वाहा।
कुमुद्वती पुष्करिणीं सीता सर्वाङ्गशोभिनी। कृषिः सहस्रप्राकारा प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि॥
उर्वीं त्वाहुर्मनुष्याः श्रियं त्वा मनवो विदुः। आशयेऽन्नस्य नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः॥
पर्जन्य पत्नि हरिण्यभिजातास्याभि नो वेद।
कालनेत्रे हविषा नो जुधस्व तृप्तिं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥
याभिर्देवा असुरानकल्पयन् यानून् गन्धर्वान् राक्षसांश्च।
ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा॥
हिरण्यसृक् पुष्करिणी श्यामा सर्वाङ्गशोभिनी।
कृषिर्हिरण्यप्राकारा प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि॥
अश्विभ्यां देवि सह स्ंविदाना इन्द्रेण राधेन सह पुष्ट्या न आगहि॥
विशस्त्वा रासन्तां प्रदिशोऽनु सर्वाहोरात्रार्धमासमास आर्तवा ऋतुभिः सह॥
भर्त्री देवानामुत मर्त्यानां भर्त्रीं प्रजानामुत मनुष्याणाम्॥
हस्तभिरित्तरासैः क्षेत्रसाराधिभिः सह। हिरण्यैरश्वैरा गोभिः प्रत्याष्टा श्रीरियं मयि॥
(कौशिक गृह्य सूत्र, अध्याय १३)
श्री रूप में देवी की स्तुति है अतः इसके कई अंश तथा नाम श्रीसूक्त जैसे हैं।
हिरण्यवर्णा-(१) सोने के रंग वाली, (२) हि+रण-रण में भ्रमरी कीतरह नाद करने वाली। (३) निमेष-उन्मेष के बीच के में अल्प समय में (हि+) स्थित होने वाली। (४) वर्णों की जननी-परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी का स्थान प्राप्त कर उन्हें उत्पन्न करती हैं।
हरिणी-(१) हरित वर्ण की। (२) हल्दी जैसी आभा वाली-पृथ्वी। (३) हिरणी जैसी शीघ्रगति वाली, चंचल, सुन्दर। मृगनयनी। (४) हरि की पत्नी। (५) नित्य युवती। (६) भक्ति के दबाव में बन्धने वाली। (७) मृगचर्म को ओढ़ने या बिछाने वाली। (८) हरि के मध्यभाग की संश्लिष्ट। (९) हरि के कार्यों में लगाने वाली। (१०) पाप हरने वाली।
हिरण्मयी-(१) सुनहरे रूप की, (२) सुवर्ण देहवाली, (३) धन-भाग्य से परिपूर्ण, (४) हिरण्यरेतस् शिव की हिरण्मयी शक्ति, (५) पवित्रता युक्त, (६) षड् विकार से मुक्त तैजस शरीर, (७) मूलाधार से द्वादशार तक लक्ष्मी हिरण्मयी रूप में उदित। (८) हिरण्यमण्डल में स्थित।
अनपगामिनी (अनपायिनी)-(१) अपगमन नहीं करने वाली अर्थात् स्थिर, (२) मुझे (मन्त्रद्रष्टा ऋषि) को छोड़ कर नहीं जाने वाली। (३) भगवान् को नहीं छोड़ने वाली। (४) अविनाशी ऐश्वर्य युक्त।
विभिन्न सम्पत्ति-गाम्-गाय, यज्ञ सम्पत्ति। हिरण्य-स्वर्ण आदि सम्पत्ति, अश्व-घोड़े आदि वाहन। पुरुष-पुत्र, मित्र, दास आदि, हितैषी मित्र, निष्ठावान दास।
अश्वपूर्वा-अश्व के पूर्व। जब लक्ष्मी आती है तो अश्व आदि सम्पत्ति हो जाती है। अश्व गति देने का साधन है। जब तक कर्म या श्रम नहीं किया जाय, लक्ष्मी नहीं आती। (२) इन्द्रियों को अश्व कहा गया है, उनके पूर्व रह कर उनको नियन्त्रित करने वाली। जितेन्द्रिय के पास ही लक्ष्मी रहती है। (३) नाद अभ्यास में पहले अश्व की ध्वनि सुनाई देती है। चित्तवृत्ति नियन्त्रण में सहायक।
श्री-(१) आश्रय करने योग्य (श्रिञ् सेवायाम्, पाणिनि धातुपाठ, १/६३८)। (२) भक्तों की वाणी सुनने वाली (श्रु श्रवणे, १/६७५), (३) सज्जनों के पाप नष्त करने वाली (शृ हिंसायाम्, ९/१७), (४) गुणों से विश्व का विस्तार करने वाली (शॄ विस्तारे), (५) शाश्वत शरण रूपा। (६) देव जिसे श्रद्धा (श्र) से चाहते हैं (ई = ईप्सिता), (७) श्री अक्षर के ४ खण्ड ४ प्रकार की वाणी के रूप हैं-श (शान्ता या परा वाक्), मूलाधार में, र् = रन्ती (नाभि में पश्यन्ती रूप), इ = प्रेरणी मध्यमा वाक्, अनुस्वार = बाहर गूंजती वैखरी वाक्। (८) विष्णु का आश्रय लेने वाली। (९) शक्तियों को आश्रय देने वाली। (१०) आश्रितों का पाप नाश करने वाली, या कामना पूर्ण करने वाली (रा दाने, २/५०)। (११) अपनी शक्ति से प्रकाश देने वाली या शन्तमा = मङ्गलरूपा। (१२) र् = रति, सारे विश्व की इप्सित।
आर्द्रा = पर्जन्य पत्नी। सभी द्रवों, रस की दात्री।
पुष्करिणीम्-(१) पुष्कर हाथी की सूंढ़ का अग्र भाग है, उससे अभिषिक्त। (२) कमल वाली। (३) स्वयं कमललता रूपा। (४) ममता तथा गर्व -२ हाथी के समान विशाल हैं। इनके आगे आशा और प्रीति नाम के २ स्वर्ण कलश हैं। वे तृप्ति रूपी जल से भरे हैं। इन कलशों से २ हाथियों द्वारा महालक्ष्मी का अभिषेक होता है। इस देवी के साथ आनन्द रूप विष्णु हैं। दोनों हाथी यहां शान्त हो जाते हैं। मन को विचलित नहीं करते। (५) पूष् + करिणी = पोषण करने वाली। (६) पुष्कर = कमल। कमलवाली।
पुष्टिम्-(१) पुष्टि की अधिष्ठात्री देवी। (२) स्वयं पुष्टि रूपा। (३) पोषण करने वाली-जीवन, सभ्यता के सभी अंगों को पुष्ट करने वाली।
तुष्टिम् (१) स्वयं तुष्टिरूपा -या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता (दुर्गा सप्तसती, ५/६८)। (२) अपने गुणों से विष्णु को सन्तुष्ट करने वाली। (३) विष्णु के गुणों से स्वयं सन्तुष्ट रहने वाली। (४) कर्मों द्वारा उनकी स्तुति से लक्ष्मी में सबको सन्तुष्टि मिलती है।
अथर्व वेद के कृषि सूक्त (३/१७) का सीता देवता हैं।
काण्ड ३, सूक्त १७, ऋषि विश्वामित्र। देवता सीता
सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक्। धीरा देवेषु सुम्नयौ॥१॥
= देवों में बुद्धि रखने वाले कवि (निर्माता) सुख पाने के लिए हलों को जोतते हैं और जुओं को अलग करते हैं।
युनक्त सीरा वि युगा तनोत कृते योनौ वपतेह बीजम्।
विराजः श्नुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यः पक्वमा यवन्॥२॥
= हलों को जोड़ो, जूओं को फैलाओ, बने हुए खेत में यहां पर बीज बोओ। अन्न की उपज हमारे लिए भरपूर हो। हंसुए से परिपक्व धान हमारे पास आयें।
लाङ्गलं पवीरवत्सुशीमं सोमसत्सरु। उद्द्विपतु गामवि प्रस्थावद्रथवाहनं पीवरीं च प्रफर्व्यम्॥३॥
= वज्र जैसा कठिन, सहज चलाने लाला, लकड़ी के मूठ का हल, गौ और बकरी (या भेड़ = अवि) तेज चलने वाले रथ के घोड़े या बैल मिले तथा स्त्री स्वस्थ सशक्त रहे।
इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिः रक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥४॥
सीता का अर्थ कृषि उत्पाद या उसका साधन हल की नोक है। यज्ञ इसी पर आधारित है, अतः हर यज्ञ या पूजा में हळीष (या हरीश) गाड़ते हैं। राजा रूप में इन्द्र कृषि उपज का एक भाग (कर) लेते हैं, जिससे राष्ट्र चलता है। हल अर्थ लेने पर-इन्द्र हल पकड़ें, पूषा उसकी रक्षा करे। वह रस युक्त हो कर भविष्य में रसों का प्रदान करे।
सभी यज्ञों का मूल कृषि है जिससे जीवन चलता है। अन्य सभी यज्ञ इसी पर निर्भर हैं। (गीता ३/११-१६) में इसका चक्र दिया है। इसी को कामधेनु या कामधुक् कहा है।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरो वाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥ (गीता, अध्याय ३)
= सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ से इष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है, इसे कामधुक् कहा है। अपनी विभूति वर्णन में भी कामधेनु को कामधुक् कहा गया है-धेनूनामस्मि कामधुक् (गीआ, १०/२८)
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥ (गीता, अध्याय ३)
यज्ञ चक्र है-(१) ब्रह्म या उसका अंश जीव, (२) कर्म, (३) यज्ञ, (४) पर्जन्य (जनन के लिए परिवेश, infra-structure, कृषि अर्थ में मेघ), (५) अन्न, (६) भूत (प्राणी)। इसके बाद पुनः कर्म से नया यज्ञ चक्र आरम्भ होता है।
कृषि यज्ञ द्वारा जनन का मुख्य केन्द्र होने से मिथिला के राजाको जनक कहते थे। धान, गेहूं आदि सभी अन्न दर्भ (घास) के रूप हैं। मिथिला में केवल यह दर्भ होता था, अतः यह दर्भङ्गा है। इसके चारों तरफ कम या अधिक अरण्य हैं-चम्पारण, सारण, अरण्य (आरा), कीकट (बबूल, मगध), पूर्णारण्य (पूर्णिया)। कृषि के लिए सबसे कठिन क्षेत्र विदर्भ है जहा पश्चिम घाट के पर्वतों से वर्षा रुक जाती है। मिथिला के पहले जनक इक्ष्वाकु पुत्र निमि थे। इक्ष्वाकु का अर्थ भी कृषि कराने वाला है (ईख पैदा करने वाला)। मिथिला से उस समय कर्क रेखा गुजरती थी जहां पहुंचने पर सूर्य रूपी आंख की निमि (पलक) खुल जाती थी अतः उनका नाम निमि हुआ और कहानी बनी कि उनकी पलक नहीं गिरती। विषुव रेखा पर पलक बन्द होती है पुनः मकर रेखा पर पूरी खुलती है। उत्तर में कर्क रेखा की या सूर्य रथ की नेमि की अन्तिम सीमा लखनऊ के निकट थी, अतः उसे नैमिषारण्य कहते थे।
अथर्व वेद काण्ड १९में ३२, ३३ सूक्त दर्भ के हैं।

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