सृष्टि तत्त्व तथा उसे जानने की विधि


अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)-
जैसे आजकल अवशेषों या उनके काल निर्धारण द्वारा वैज्ञानिक अनुमान लगाया जाता है, उसी प्रकार प्राचीन काल में भी हुआ था। वेद के नासदीय सूक्त में लिखा है कि सृष्टि के समय तो देवता भी नहीं थे अतः निश्चित रूप से कौन कह सकता है कि सृष्टि कैसे हुयी।
को अद्धा वेद क इह प्रवोचत्, कुत अजाता कुत इयं विसृष्टिः।
अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आ बभूव॥ (ऋक्, १०/१२९/६)
= कौन पूरे निश्चय से कह सकता है कि यह सृष्टि कहां से आविर्भूत हुयी और इसके नाना भेद (विसृष्टि) कैसे हुए? जिस समय सृष्टि उयी उस समय देव भी नहीं हुए थे। अतः कोई नहीं जान सकता कि यह सृष्टि कैसे हुई।
सृष्टि के विषय में जानने की विधि भी कई स्थानों पर दी गयी है-
देवानां नु वयं जाना प्र वोचाम विपन्यया। उक्थेषु शस्यमानेषु यः पश्चादुत्तरे युगे॥१॥
ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मार इवाधमत्। देवानां पूर्व्ये युगे ऽसतः सदजायत्॥२॥
देवाना युगे प्रथमेऽसतः सदजायत। तदाशा अन्वजायन्त तदुत्तान पदस्परि॥३॥
(ऋक्, १०/७२, ऋषि-लौक्य बृहस्पति, आङ्गिरस)
= हमने देवों से सुना जिन्होंने पहले कहा था। सृष्टि के बाद उत्तर युग में जो उक्थ (बचा हुआ, अवशेष) था या जैसे बन रहा था, उससे अनुमान किया कि कैसे सृष्टि हुई थी। ब्रह्मणस्पति (ब्रह्माण्ड के भीतर का निर्माता) ने लुहार (कर्मार) की तरह भट्ठी में (सूर्य जैसे ताराओं में) निर्माण किया। देवों से पूर्व असत् से सत् (दृश्य) हुआ था। देवों के युग में भी असत् से सत् हुआ। उसके बाद दिशाओं का ज्ञान हुआ (ग्रहों के या पृथ्वी का ठोस पिण्ड बनने के बाद। इसी के उत्तान पद से अनुमान किया। स्रोत सिर है, निर्माण पद है। असत् से सत् निर्माण १० वर्ष तक देखा, उस पद का १० लाख वर्ष विस्तार कर अनुमान किया कि वैसा ही हुआ होगा। यह पद का प्रसार या उत्तानपाद है। या किलोमीटर की माप कर पृथ्वी के आकार का अनुमान एवं गणना की, पृथ्वी से तुलना कर चन्द्र की दूरी, उसकी तुलना से सूर्य या ग्रहों की दूरी, फिर अन्य ताराओं की दूरी और ब्रह्माण्ड का आकार ज्ञात किया। वही नियम मान कर ब्रह्माण्ड से बड़े आकारों का अनुमान किया। ये सभी उत्तान पाद के उदाहरण हैं। प्रत्यक्ष से लाखों बड़े विस्तार का अनुमान उत्तानपाद है। स्वायम्भुव मनु काल में जिसके नेतृत्व में सौर मण्डल या ब्रह्माण्ड की माप हुयी उनको उत्तानपाद कहा गया। निकट के तारा सूर्य के ग्रहों के क्षेत्र की जिसने माप की उनको प्रियव्रत कहा गया।
ये वा उ ह तद् रथ चरण नेमि कृत परिखा तास्ते सप्त सिन्धव आसन् यत एव कृताः सप्त भुवो द्वीपाः॥३१॥ जम्बू-प्लक्ष-आल्मलि-कुश-क्रौञ्च-शाक-पुष्कर संज्ञाः तेषां परिमाणं पूर्वस्मात् पूर्वस्मात् उत्त उत्तरः यथा संख्यं द्विगुण मानेन बहिः समन्तत उपक्लृप्ताः॥३२॥ (भागवत, पुराण, ५/१) = जैसे पृथ्वी के द्वीप हैं, उसी प्रकार सूर्य के द्वीपों के नाम हुए जो ग्रह कक्षा रूपी रथ-चक्र से बने हैं और क्रमशः पूर्व से २ गुणे हैं। (पृथ्वी के द्वीप वृत्ताकार नहीं हैं, न जम्बू द्वीप से आरम्भ कर क्रमशः २-२ गुणे बड़े हैं)
एवं द्वीपाः समुद्रैश्च सप्त सप्तभिरावृताः।
द्वीपश्चैव समुद्रश्च समानौ द्विगुणौ परौ॥ (विष्णु पुराण, २/४/८८)
ग्रह कक्षाओं के आकार का यह अनुपात आजकल बोड नियम कहते हैं। सूर्य से शनि की दूरी का १०० भाग करने पर, बुध ४, शुक्र ४+३ = ७ भाग, पृथ्वी ४+६ =१०, मंगल ४+१२ = १६ है-४ में ०, ३, ६, १२ जोड़ते हैं।
अन्यत्र भी यह स्पष्ट किया है-
एतानेव भू-वलय संनिवेशः प्रमाण लक्षणतो व्याख्यातः॥१॥ एतेन हि दिवो मण्डलमानं तद्विद उपदिशन्ति यथा द्वि-दलयोः निष्पावादीनां ते अन्तरेण अन्तरिक्षं तदुभय सन्धितम्॥२॥
= भू-वलय का यह विस्तार बता दिया। इसी जैसा विद्वान् द्यु लोक की भी माप कहते हैं, जैसे दाल का एक दाना देखने से दूसरे दाना का भी पता चलता है।
विष्णु पुराण (२/७/३-४) में स्पष्ट कहा है कि सूर्य चन्द्र से प्रकाशित भाग को पृथ्वी कहते हैं-दोनों से प्रकाशित पृथ्वी ग्रह, सूर्य प्रकाश का क्षेत्र सौर मण्डल, सूर्य प्रकाश की सीमा ब्रह्माण्ड। तीनों पृथ्वी से उनके आकाश उतने ही बड़े हैं, जितना मनुष्य से पृथ्वी ग्रह। वेद में ३ पृथ्वी तथा उनके ३ आकाश को ३ माता तथा ३ पिता कहा गया है। उनके बीच के भाग को व्रत या अन्तरिक्ष कहा है।
रविचन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभास्यते।
स समुद्र सरिच्छैला पृथिवी तावती स्मृता ।३।
यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तार परिमण्डलात् ।
नभस्तावत्प्रमाणं वै व्यास मण्डलतो द्विज ।४। (विष्णु पुराण, २/७/३,४)
तिस्रो मातॄस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति ।
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋग्वेद, १/१६४/१०)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद, २/२७/८)
सृष्टि का निर्माण क्रम समझाने के लिए पृथ्वी पर दृश्य वस्तुओं की ही उपमा दी गयी है। आकाश के खाली जैसे दीखते अन्तरिक्ष में विरल पदार्थ का विस्तार को कई प्रकार का जल कहा गया है। उससे निकले पिण्ड को पद्म (पद रखने का आधार), पुष्कर (जिसका जल सूख गया है-कमल को कहते हैं कि जल में रह कर भी उससे लिप्त नहीं होता)। गोल पृथ्वी का समतल चित्र भी वैसे ही बनता है जैसे कमल के दलों को खोल कर कागज पर फैलाया जाय। उत्तर गोल को ४ भाग में बांट कर उसका समतल चित्र बनाए हैं। इस अर्थ में पृथ्वी ४ दल का कमल है।
(विष्णु पुराण २/२)-
भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः।२४।
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा।
पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः।४०।
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहु योजन विस्तृते।
सर्व तेजो गुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते।
तच्च पद्म पुराभूतं पृथिवी रूपमुत्तमम्।
नारायण समुद्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः॥ (पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, ४०/२-३)
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः।
तमुत्वा दध्यङ् ऋषि पुत्र ईधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम्॥
(ऋक्, ६/१६/१३-१४)
अन्य वर्णन है कि फैला हुआ स्रोत पदार्थ जल जैसा (अप्), निर्मित पिण्ड भूमि है, उन दोनों के बीच की स्थिति वराह (जल-स्थल का जीव), या मेघ (जल+ वायु मिश्रण) है। निर्मित पदार्थ पुष्कर है, निर्माणकर्ता वराह है। अतः विभिन्न स्तरों के निर्माण का वर्णन ब्रह्म या ब्रह्म वैवर्त्त पुराण में है, निर्माण प्रक्रिया का वर्णन वराह और वायु पुराण में है।
हरिवंश पुराण (३३/५) में लिखा है कि महावराह ने सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया समझायी थी। अध्याय (३३-३५) में विभिन्न स्तरों के वराहों द्वारा निर्माण कहा है।
अनन्त आकाश में आदि या महा वराह द्वारा खरबों ब्रह्माण्ड बने।
प्र काव्यमुशनेव ब्रुवाणो देवो देवानां जनिमा विवक्ति।
महिव्रतः शुचिबन्धुः पावकः पदा वराहो अभ्येति रेभन्॥ (ऋक्,९/९७/७)
इससे आकाश में पहले स्तर के द्रप्स निकले (स्कन्द हुए)-
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिं अनु यश्च पूर्वः (ऋक्, १०/१७/११)
ब्रह्माण्ड के भीतर यज्ञ-वराह ने ताराओं का निर्माण किया। निर्माण पूर्व ब्रह्माण्ड या तारा मेघ या द्रव विन्दु (द्रप्स) जैसे थे।
ब्रह्माण्ड के द्रप्स अव (नीचे स्तर के) तथा प्रकाशमान (तारा) हैं-
अव द्रप्सो अंशुमतीं अतिष्ठत् इयानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः (कृष्ण = आकर्षण केन्द्र द्वारा लाखों तारा अपने स्थान पर स्थित हैं) (ऋक्, ८/९७/१३)
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थे अधारयत्तव तित्विषाणः (ऋक्, ८/९७/१५)
सौर मण्डल के भीतर पृथ्वी भी पहले हिरण्मय थी-ऊपर पद्म पुराण के उद्धरण में कहा है कि पृथ्वी पहले हिरण्मय पद्म थी।
इसका जिस पदार्थ से निर्माण हुआ वह सूर्य से १०० योजन ऊंचा (१०० सूर्य व्यास दूर) तथा १० योजन मोटा था। सूर्य से पृथ्वी की दूरी १०८-१०९ योजन या सूर्य व्यास है।
जलक्रीडा रुचिस्तस्माद् वाराहं रूपमस्मरत्।
हरिरुद्धरणे युक्तस्तदाभूदस्य भूमिभृत्॥२९॥
अधृष्यं सर्व भूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसम्म्तम्।
दश योजन विस्तारं उच्छ्रितं शत योजनम्॥३०॥
(हरिवंश पुराण, ३/३४/२९-३०, वायु पुराण, ६/१०-११)
स्वर्ण जैसा तप्त प्रकाशमान् पृथ्वी पिण्ड जल वर्षा से धीरे धीरे ठण्ढा हुआ-
यदण्ड मध्ये स्कन्नं तत् ऋतमासीत् समाहितम्॥७॥
जातरूपं तदभवत् तत् सर्वं पृथिवी तले।
तस्य क्लेदार्णवौघेन प्राच्छादत समन्ततः॥८॥
यत्र यत्र जलं स्कन्नं तत्र तत्र स्थितो गिरिः।
शैलैः समस्तैर्गहना विषमा मेदिनी भवत्॥१२॥
द्रप्सं स्कन्न ब्रह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे त्वाददन्त (ऋक्, ७/३३/११)
यह प्रादेशमात्री पृथ्वी है, जिसका एमूष वराह (वायुमण्डल) ने उद्धार किया।
तां प्रादेशमात्रीं (१० अंगुल) पृथिवीं-एमूष इति वराह उज्जघान । सोऽस्याःपृथिव्याःपतिः प्रजापतिः। (शतपथ ब्राह्मण, १४/१/२/११)
मनुष्य रूपी वराह अन्य थे जिन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया था।

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