हयग्रीव अवतार महात्म्य

-श्री अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)-
१. महाभारत कथा-महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय ३४७ के अनुसार विराट् सृष्टि (पिण्ड एवं उनके अधिष्ठान) अनिरुद्ध रूप है। उसमें अहंकार रूप (हर पिण्ड का व्यक्तित्व) ही ४ मुख के ब्रह्मा हैं। वे शेष शायी विष्णु के कमल से उत्पन्न हुए और सत्त्वगुण द्वारा प्राणी सृष्टि करने को उद्यत हुए। जिस कमल पर ब्रह्मा जी बैठे थे, उस पर जल की २ बून्दें पड़ीं थी-उसमें तमोगुणरूपी बून्द विष्णु की दृष्टि पड़ने से मधु दैत्य हुई तथा रजोगुण रूपी बून्द कैटभ दैत्य हुई। वे कमल नाल के अनुसार आगे बढ़ते हुए ब्रह्मा तक पहुंचे तथा उनके हाथों में ४ वेदों को देखा। वे वेदों को हर कर पूर्वोत्तर समुद्र में घुस कर रसातल में चले गये और वहां वेदों को छिपा दिया। बिना वेद के ब्रह्मा जी सृष्टि रचना में असमर्थ हो गये और उसके लिए विष्णु की प्रार्थना की। अपने ७ जन्मों के बारे में कहा तथा जिसमें यह पद्मनाभ रूप में जन्म सातवां था। इसके बाद विष्णु निद्रा त्याग कर हयग्रीव रूप में प्रकट हुए जो पूरे ब्रह्माण्ड का ही स्वरूप थे। नक्षत्र तथा तारा उनका सिर, सूर्य किरणें सिर के केश, आकाश-पाताल उनके कान, पृथ्वी ललाट थी। गंगा-सरस्वती उनके नितम्ब, २ समुद्र उनकी भौंह थी। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र, सन्ध्या उनकी नासिका थी। ॐकार उनका संस्कार (आभूषण) तथा विद्युत् उनकी जिह्वा थी। सोमपा पितर उनके दांत, गोलोक और ब्रह्मलोक उनके ओठ थे। कालरात्रि उनकी ग्रीवा थी। विश्वरूप हयग्रीव वहां से अन्तर्धान हो कर हयग्रीव मनुष्य रूप में रसातल जा कर साम गान करने लगे। मधु-कैटभ ने वेदों को काल-पाश से बान्ध कर रसातल में फेंक दिया तथा ध्वनि की दिशा में दौड़े। इस बीच हयग्रीव ने रसातल में पड़े उन वेदों को ले लिया तथा ब्रह्मा जी को दे दिया। उसके बाद वे पूर्वोत्तर समुद्र में रहने लगे। ध्वनि के स्थान पर मधु कैटभ ने कुछ नहीं देखा तो वे रसातल से ऊपर उठे और शेष नाग पर सोये हुए भगवान् को देखा। उन लोगों ने भगवान् को जगाया तथा उनसे युद्ध आरम्भ किया। भगवान् ने उन दोनों असुरों को मार दिया।
२. शतपथ ब्राह्मण-माध्यन्दिन शतपथ ब्राह्मण के काण्ड १४ के प्रथम ३ अध्याय प्रवर्ग्य काण्ड हैं। इसके प्रथम अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में हयग्रीव उत्पत्ति के विषय में लिखा है। काण्व शतपथ ब्राह्मण का काण्ड १६ प्रवर्ग्य काण्ड है जिसके प्रथम अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में हयग्रीव वर्णन है। दोनों प्रायः समान है।
दो अश्विन के अतिरिक्त अन्य सभी देवों अग्नि, इन्द्र, सोम, मख, विष्णु और विश्वेदेव ने कुरुक्षेत्र में यज्ञ आरम्भ किया, अतः उस स्थान को कुरुक्षेत्र या देवयजन कहते हैं। उन्होंने प्रचुर अन्न धन की कामना की और कहा कि हमलोगों में जो भी अपने तप से यज्ञ पूरा करेगा, वह श्रेष्ठ माना जायेगा। सबसे पहले विष्णु ने यज्ञ पूरा किया अतः विष्णु को ही देवों में श्रेष्ठ तथा यज्ञ कहते हैं। विष्णु की तरह सभी यश चाहते हैं। विष्णु अपने ३ बाणों के साथ धनुष ले कर धनुष के सिरे पर सिर रख कर सो गये। देवों को आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ। (उनकी इच्छा देख कर) वम्रि (worm) या उपदिक (काटने, कतरने वाला-दीमक) ने पूछा-यदि मैं धनुष की डोरी काट दूं तो मुझे क्या मिलेगा? देवों ने कहा-तुमको मरुभूमि में भी जल तथा भोजन मिलेगा। वम्रि विष्णु के पास गया और धनुष की डोरी काटने लगा। डोरी कटने से वह नीचे गिरी और विष्णु का सिर काट दिया। सिर गिर कर आदित्य (सूर्य का आदि रूप) बना। डोरी काटने और सिर गिरने से घृङ्ङ्-घॄङ्ङ् शब्द हुआ। अतः सूर्य के ताप को घर्म कहते हैं।
घर्म से घाम (धूप) या गर्म (तप्त) शब्द हुए हैं। घर्म का स्रोत सूर्य घृणि हुआ। काटने, या नष्ट करने के अर्थ में घृणा हुआ। शक्ति सञ्चय रूप में घृत है। शं वातः शं हिते घृणिः (वाज. यजु. ३५/८, मैत्रायणी सं. ३/१४/२०)। इस अर्थ के ३ मूल धातु हैं-घृ क्षरणदीप्त्यों (पाणिनीय धातु पाठ, ३/१४)-दीप्ति, क्षरण, टपकना आदि। घृ प्रस्रवणे (१०/११८)-गिरना, टपकना। घृणु दीप्तौ (८/७)-चमकना।
सिर कटने के बाद शरीर तथा सिर पूर्व भाग में गिर गया। सिर अलग होने (प्रवृज) प्रवर्ग्य कहा गया। घर त्यागने को भी प्रव्रज्या कहते हैं-व्रज संस्कार गत्योः (१०/८३)। देवों ने कहा हमारा महान् वीर नीचे पड़ा है, अतः इसे महावीर कहा। उससे निकले रस को अपने हाथों से पोंछा, अतः उसे सम्राट् (सां मार्ज्) कहा गया। देव उसके पास दौड़े। इन्द्र ने पहले पहुंच कर उनको अपने भीतर व्याप्त कर लिया। अपने भीतर मख (विष्णु) होने के कारण इन्द्र को मखवत् या मघवत् (मघवा) कहा गया।
देवों ने यज्ञ रूप विष्णु के ३ भाग किये तथा बांट दिया-
(१) प्रातः सवन-वसु, अग्नि, गायत्री छन्द।
(२) माध्यन्दिन सवन-रुद्र, इन्द्र, त्रिष्टुभ्।
(३) तृतीय सवन-आदित्य, विश्वेदेव, जगती।
इस छिन्न-शीर्ष यज्ञ से देवों ने यज्ञ और तप आरम्भ किया।
दध्यङ् अथर्वण इस प्रवर्ग्य यज्ञ का रहस्य जानते थे और कहा कि बिना सिर लगाये यज्ञ पूरा नहीं होगा। इन्द्र ने कहा कि इसका रहस्य बताने पर वे दध्यङ् का सिर काट देंगे। अश्विनों ने यह सुना और दध्यङ् से कहा कि रहस्य बताने पर वे बचा लेंगे। उनका सिर काट कर छिपा देंगे तथा घोड़े का सिर लगा देंगे। जब इन्द्र घोड़े वाला सिर काटेंगे, तो पुनः मूल सिर लगा देंगे। दध्यङ् ने घोड़े के सिर से प्रवर्ग्य यज्ञ का रहस्य बताया।
सूर्य ही प्रवर्ग्य है।
माध्यन्दिन शतपथ ब्राह्मण के मूल मन्त्र-काण्ड १४, अध्याय १, ब्राह्मण १-
देवा ह वै सत्रं निषेदुः। अग्निरिन्द्रः सोमो मखो विष्णुर्विश्वेदेवाः। अन्यत्रैवाश्विभ्याम्॥१॥ तेषां कुरुक्षेत्रं देवयजनमास। तस्मादाहुः। कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनमिति। —॥२॥ त आसत श्रियं गच्छेम। यशः स्याम। अन्नादाः स्यामेति॥३॥ ते होचुः। यो नः श्रमेण तपसा श्रद्धया यज्ञेनाहुतिभिर्यज्ञस्योदृचं पूर्वोऽवगच्छात्। स नः श्रेष्ठोऽसत्। –॥४॥ तद्विष्णुः प्रथमः प्राप। स देवानां श्रेष्ठोऽभवत्। तस्मादाहुः-विष्णुर्देवानां श्रेष्ठ इति॥५॥ स यः स विष्णुः। यज्ञः सः।–॥६॥
स तिसृ धन्वामादायापचक्राम। स धनुरार्त्न्या शिर उपस्तभ्य तस्थौ। तं देवा अनभिधृष्णुवन्तः समन्तं परिण्यविशन्त॥७॥ ता ह वम्र्य ऊचुः। इमा वै यदुपदीकाः। योऽस्य ज्यामप्यद्यात्। किमस्मै प्रयच्छेतेति। अन्नाद्यमस्मै प्रयच्छेम। अपि धन्वन्नपोऽधिगच्छेत्। तथाऽस्मै सर्वमन्नाद्यं प्रयच्छेमेति। तथेति॥८॥ तस्योपपरासृत्य ज्यामपि जक्षुः। तस्यां छिन्नायां धनुरार्त्न्यौ विष्फुरन्त्यौ विष्णोः शिरः प्राचिच्छिदतुः॥९॥ तद् घृङ्ङ् इति पपात। तत् पतित्वा असौ आदित्यो अभवत्। अथेतरः प्राङेव प्रावृज्यत। तद्यद् घृङ्ङ् इत्यपतत्। तस्माद् घर्मः। अथ यत् प्रावृज्यत। तस्मात् प्रवर्ग्यः॥१०॥ ते देवा अब्रुवन्। महान् बत नो वीरो अपादीति। तस्मान् महावीरः। तस्य यो रसो व्यक्षरत्। तं पाणिभिः संममृजुः। तस्मात् सम्राट्॥११॥ तं देवा अभ्यसृज्यन्त। यथा वित्तिं वेत्स्यमानाः। एवम् तमिन्द्रः प्रथमं प्राप। तमन्वंगमनु न्यपद्यत। तं पर्यगृह्णात्। तं परिगृह्य इदं यशो अभवत्। यदिदमिन्द्रो यशः। –॥१२॥ स उ एव मखः। स विष्णुः। तत इन्द्रो मखवानभवत्। — तं मघवान् इत्याचक्षते–॥१३॥
अथेमं विष्णुं यज्ञं त्रेधा व्यभजन्त। वसवः प्रातः सवनम्। रुद्रा माध्यन्दिनं सवनम्। आदित्यास्तृतीय सवनम्॥१५॥ अग्निः प्रातः सवनम्। इन्द्रो माध्यन्दिनं सवनम्। विश्वेदेवास्तृतीय सवनम्॥१६॥ गायत्री प्रातः सवनम्। त्रिष्टुप् माध्यन्दिनं सवनम्। जगती तृतीय सवनम्। तेनापशीर्ष्णा यज्ञेन देवा अर्चतः श्राम्यन्तश्चेरुः॥१७॥ दध्यङ् ह वा आथर्वणः। एतं शुक्रमेतं यज्ञं विदाञ्चकार। यथायथैतद् यज्ञस्य शिरः प्रतिधीयते यथैष कृत्स्नो यज्ञो भवति॥१८॥ स हेन्द्रेणोक्त आस। एतं चेदन्यस्मा अनुब्रूमाः। तत एव ते शिरश्छिन्द्यामिति॥१९॥ तदु हाश्विनोरनुश्रुतमास।—॥२०॥
—अथ ते शिरश्छित्त्वा अन्यत्रापनिधास्यावः। अथाश्वस्य शिर आहृत्य तत्ते प्रतिधास्यावः। — अथ ते तदिन्द्रः शिरश्छेत्स्यति। अथ ते स्वं शिर आहृत्य तत्ते प्रतिधास्याव इति॥२३॥ — तस्मादेतद् ऋषिणा अभ्यनूक्तम्। दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा य प्र यदीमुवाच-इति।–॥२५॥ — एष वै संवत्सरः। य एष तपति। एष उ प्रवर्ग्यः।–॥२७॥ ३. पुराण- (१) देवीभागवत पुराण-इसके स्कन्ध १ के अध्याय ५ के अनुसार विष्णु भगवान् १० हजार वर्षों तक युद्ध कर थक गये थे और धनुष पर सिर रख कर सो गये। कुछ समय बाद ब्रह्मा, शिव, इन्द्र आदि देव यज्ञ करने के लिए यज्ञ अधिपति विष्णु के वैकुण्ठ लोक गये। वहां नहीं पा कर ज्ञान दृष्टि से खोज कर सोए हुए विष्णु के पास गये। उनको जगाने के लिए ब्रह्मा ने वम्रि का सृजन किया और उसे धनुष का अग्र भाग खाने के लिए कहा। वह पाप करने को तैयार नहीं हुआ तो उसे यज्ञ की हवि के गिरे हुए भाग को खाने का अधिकार दिया। धनुष का कोना खाने से उसकी डोरी खुल गयी और भयानक शब्द तथा कम्पन हुआ। शान्त होने पर देवों ने देखा कि विष्णु भगवान् का सिर कट कर दूर चला गया है। विष्णु का सिर लवण-सागर में गिरने के बाद ब्रह्मा ने वेदों को आदेश दिया कि वे समाधान के लिए भगवती की स्तुति करें। भगवती ने प्रकट हो कर कहा कि एक बार विष्णु जी सिन्धु पुत्री लक्ष्मी को देख कर हंस दिये थे। लक्ष्मी को लगा कि वे अन्य स्त्री में आसक्त हो गये हैं तथा उनको शाप दिया कि तुम्हारा सिर कट कर गिर जाय। एक अन्य कारण था कि हयग्रीव दैत्य ने सरस्वती नदी तट पर एकाक्षर मत्र (ह्रीं) जप सहित हजार वर्षों तक तप किया। देवी के प्रकट होने पर उसने अमर होने का वर मांगा। यह असम्भव था, अतः उसने अन्य वर मांगा कि उसका वध केवल हयग्रीव द्वारा ही हो। अतः हयग्रीव के अत्याचार से रक्षा के लिए त्वष्टा घोड़े का सिर विष्णु को लगा दें। देवों ने विश्वकर्मा को आदेश दिया और उन्होंने घोड़े का सिय विष्णु भगवान् को लगा दिया। हयग्रीव रूप में भगवान् ने हयग्रीव दानव का युद्ध में वध कर दिया।
देवीभागवत पुराण (८/८/२२-२७), भागवत पुराण (५/१८/१-६) के अनुसार भद्राश्व वर्ष में भद्रश्रवा द्वाता हयग्रीव रूप में भगवान् की पूजा होती है, जो दैत्यों द्वारा अपहृत वेदों को रसातल से लाये थे।
(२) स्कन्द पुराण (वैष्णव खण्ड, अध्याय २/३/५-६) तथा में भी प्रायः यही कथा है। मधु कैटभ ने वेदों का हरण किया, तो ब्रह्मा जी बदरी तीर्थ में विष्णु भगवान् के पास उद्धार के लिए गये। तब भगवान् ने द्रव रूप वेदों का उद्धार कर उनको ४ वेदों के क्रम अनुसार व्यवस्थित किया तथा ब्रह्मा को दिया। जहां वेदों का अनुक्रम हुआ, वह स्थान ब्रह्म कुण्ड है। स्कन्द पुराण (ब्रह्म खण्ड, अध्याय ३/२/१४-१५) में वम्रि द्वारा विष्णु के सिर कटने की कथा देवी भागवत पुराण जैसी है। किन्तु इसमें ब्रह्मा के शाप से सिर कटा था। ब्रह्मा की सभा में वेदों के अर्थ की चर्चा हो रही थी तो विष्णु ने उनकी भूल बता कर सही अर्थ कहा। इसे अहंकार मान कर ब्रह्मा ने शाप दिया था।
४. हयग्रीव द्वारा ज्ञान-ब्रह्माण्ड उत्तर (३) भाग में अध्याय ५ से ४४ तह हयग्रीव द्वारा अगस्त्य को काञ्चीपुरम् में ललिता पूजा द्वारा मुक्ति का उपदेश है। इसी में ललिता उपाख्यान, भण्डासुर वध तथा ललिता सहस्रनाम है। हयग्रीव के शक्ति सूत्र हैं जिनकी पण्डित काशीनाथ अभयंकर द्वारा संस्कृत व्याख्या पुणे से प्रकाशित है। अगस्त्य के शक्ति सूत्र विस्तार से हैं तथा उनके द्वारा पञ्चाक्षरी विद्या का हादि, कादि, सादि में विभाजन हुआ। हयग्रीव ने वेदों का क्रम कैसे निर्धारित किया, यह पता नहीं है। अभी हमारे पास कृष्ण द्वैपायन के शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनि, सुमन्तु द्वारा निर्मित अनुक्रम उपलब्ध है।
भारत का पूर्वोत्तर समुद्र प्रशान्त महासागर है, जिसके बाद रसातल है जिसमें दक्षिणी अमेरिका आता है। भूगोल के मानचित्र के लिये उत्तर गोलार्ध में ४ विभाग थे-भारत (उज्जैन से पूर्व पश्चिम ४५-४५ अंश तक, विषुव से उत्तरी ध्रुव तक), पूर्व में भद्राश्व, पश्चिम में केतुमाल, विपरीत दिशा में कुरु वर्ष। पृथ्वी पर ३ कुरु हैं-कुरुक्षेत्र, उत्तर कुरु (साइबेरिया का ओम्स्क) प्रायः उज्जैन की देशान्तर रेखा पर हैं। इनके विपरीत कुरुवर्ष उत्तर अमेरिका में है। इन ४ खण्डों को भूपद्म का ४ दल कहा गया है। भारत के अतिरिक्त अन्य दलों को तल कहा गया है-पश्चिम में अतल, पूर्व में सुतल, विपरीत दिशा में पाताल। इन दलों के दक्षिण हैं, भारत के दक्षिण तल या महातल (कुमारिका समुद्र), उसके पश्चिम तलातल, पूर्व में वितल, विपरीत दिशा में रसातल।
द्वीप रूप में ७ भूखण्ड हैं (अनन्त द्वीप अण्टार्कटिका के अतिरिक्त)-जम्बू द्वीप (एशिया), प्लक्ष (यूरोप), कुश द्वीप (विषुव के उत्तर अफ्रीका), शाल्मलि द्वीप (विषुव के दक्षिण अफ्रीका), शक या अग्नि द्वीप (भारत के अग्नि कोण में आस्ट्रेलिया), क्रौञ्च द्वीप (पक्षी आकार का उत्तर अमेरिका तथा राकी पर्वत), पुष्कर द्वीप। पुष्कर द्वीप भारत के पुष्कर (उज्जैन से १२ अंश पश्चिम बुखारा) के विपरीत पुष्कर द्वीप है।
रसातल में कुछ भाग पुष्कर द्वीप, कुछ प्रशान्त महासागर है। वहां वेदों को नष्ट किया गया था। अतः शौनक के चरण व्यूह में कृष्ण यजुर्वेद की शाखायें सभी द्वीपों में कही गयी है। केवल पुष्कर में नहीं है।
भारत के उत्तर पूर्व महासागर जाने के बाद रसातल मिलता है, उसके दक्षिण पूर्व भाग में।
हयग्रीव भी पूर्वोत्तर भाग गये थे जहां भद्राश्व वर्ष है, अतः वहां उनकी पूजा होती है (थी)। आज भी जापान समुद्र का क्षेत्र अश्व अक्षांश (Horse latitude) कहा जाता है। यहां अश्व का अर्थ समुद्री वायु है जो यहां मन्द या भद्र हो जाती है।
५. आकाश में अर्थ-सम्पूर्ण विश्व पुरुष या विष्णु रूप है। यह एक ही निर्मित भाग है। बाकी ३ रस रूप समुद्र शेष या अनन्त हैं जिसमें निर्मित जगत् रूपी विष्णु सोये हुए हैं। इसे उच्छिष्ट गणपति भी कहते हैं। इसका कमल नाल ब्रह्माण्डों का परस्पर आकर्षण है जिसमें ब्रह्मा रूपी ब्रह्माण्ड है। यह अमृत ब्रह्मा है।
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥ (पुरुष सूक्त, वाज.सं. ३१/३)
हमारा ब्रह्माण्ड महाविष्णु है। इसका निर्माण गोलोक या कूर्म चक्र में होता है, जो ब्रह्माण्ड का १० गुणा है और अभी ब्रह्माण्ड के आभामण्डल रूप में दीखता है। ब्रह्माण्ड के केन्द्र में आकर्षक कृष्ण है, जिसके आकर्षण से यह लोक स्थित है।
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सवितारथेनादेवो याति भुवनानि पश्यन्॥
(ऋक्, १/३५/२, वाज. सं. ३३/४३, ३४/३१. तैत्तिरीय सं. ३/४/११/२, मैत्रायणी सं. ४/१२/६)
इसकी सर्पाकार भुजा शेष नाग या अहिर्बुध्न्य है। इसमें जहां सूर्य है, उस भाग में भुजा के मोटाई व्यास का गोल महर्लोक है जिसके १००० तारा शेष के १००० सिर हैं। उनमें १ सिर सूर्य है जो विष्णु का द्य्श्य रूप है। सौर मण्डल मर्त्य ब्रह्म है। ब्रह्माण्ड के तारा इसके कण हैं, जिनका समूह गणेश है। इन कणों की आन्तरिक क्रिया सूक्ष्म मूषिक है, जिसके कारण सूर्य इससे निकल कर उत्पन्न हो रहे हैं। इसी से जीवन चल रहा है, अतः यह विष्णु का सिर है।
हमारे सौर मण्डल में सूर्य विष्णु है, पृथ्वी पद्म है (पद्भ्यां पृथ्वी), जहां हम पद रखते हैं, या विश्व निर्माण की अन्तिम क्रिया। सूर्य का आकर्षण तथा उससे आने वाला तेज कमल-नाल है। पृथ्वी का संचालक ब्रह्मा है।
आकाश के ७ ब्रह्मा ७ मन्वन्तर की सृष्टि हैं। ब्रह्माण्ड मनु तत्त्व है क्योंकि इसके १०० अरब तारों की प्रतिमा मनुष्य मस्तिष्क है जिसमें १०० अरब कोषिका (कलिल, cell) हैं। (शतपथ ब्राह्मण, १२/३/२/५,१०/४/४/२)। अतः इसका १ अक्ष भ्रमण मन्वन्तर है-प्रायः ३०.६८ करोड़ वर्ष। पृथ्वी पर ७ मनुष्य रूप ब्रह्म हुए, जिनमें पद्मनाभ ब्रह्मा मणिपुर (भारत रूपी अजनाभ की नाभि) के निकट थे जिसके निकट ब्रह्मपुत्र नद तथा ब्रह्म देश (म्याम्मार) है।
६. प्रवर्ग्य यज्ञ-विश्व का निर्माता तथा सामग्री एक ही ब्रह्म है। सामग्री रूप में उसने अपना ही उपयोगी भाग हवन कर दिया, जो कटा हुआ सिर है। अपना हवन ही सर्वहुत यज्ञ है।
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥७॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥८॥ (पुरुष सूक्त)
इनमें कई पशु वेदों के रूप कहे गये हैं। द्रव रूप वेद साम है, अर्थात् महिमा, इसमें गति अश्व है। अतः हयग्रीव द्वारा सामवेद का गायन हुआ। विश्वकर्म शास्त्र में वेदों का स्वरूप कहा गया है-ऋग्वेदस्य विश्वकर्मशास्त्रात्-
ऋग्वेदः श्वेतवर्णः स्यात् द्विभुजो रासभाननः। अक्षमालाधरः सौम्यः प्रीतश्चाध्ययनोद्यतः॥
सामवेदस्य-नीलोत्पलदलाभासः सामवेदो हयाननः। अक्षमालान्वितो दक्षे वामे कम्बूधरः स्मृतः॥
यजुर्वेदस्य- अजास्यः पीतवर्णः स्यात् यजुर्वेदोऽक्षसूत्रधृक्। वामे कुलिशपाणिस्तु भूतिदो मङ्गलप्रदः॥
अथर्ववेदस्य-आथर्वणाभिधो वेदो धवलो मर्कटाननः। अक्ष-सूत्रञ्च खट्वाङ्गं विभ्राणोऽयं जयप्रियः॥
अश्व का अर्थ है क्रियात्मक या गति शील। इस अर्थ में वह सूर्य है या उसका स्थान वरुण (ब्रह्माण्ड का द्रव रूप)।
सौर्यो वा अश्वः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१९)
वारुणो ह्यश्वः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/५/३, शतप्थ ब्राह्मण, १३/२/५/४ आदि)
केवल सामग्री से निर्माण नहीं हो सकता, उसके लिए चेतन व्यक्ति भी चाहिए। इसे शतपथ ब्राह्मण में मख रूप विष्णु कहा है।
सूर्य जिस रूप में पृथ्वी तथा ग्रहों को आकृष्ट करता है, वह विष्णु है। उससे निकला तेज इन्द्र है, अतः इन्द्र ने विष्णु की ही शक्ति अपने में समाहित की है। सूर्य तेज के ३ क्षेत्र हैं, पृथ्वी तक ताप या अग्नि, यूरेनस तक तेज या वायु (सौर वायु), उसके बाद सौर मण्डल की सीमा तक रवि।
पृथ्वी के भीतर ३ क्षेत्र तथा बाहर ३० क्षेत्र या धाम हैं। इन ३३ धामों का प्राण (तेज) ३३ देव हैं। पृथ्वी केन्द्र से ८ अहर्गण (धाम माप) तक अग्नि के रूप ८ वसु, उसके बाद ११ धाम में वायु रूप ११ रुद्र तथा अन्त में प्रकाश रूप १२ आदित्य हैं, जिनमें विष्णु अन्तिम है। अतः केन्द्र से अग्नि प्रथम है, परिधि से विष्णु। सौर मण्डल के बाहर विश्वेदेव हैं।
गायत्री छन्द से सूर्य के गुरुत्व क्षेत्र की माप है (सूर्य से २४ अहर्गण, सूर्य से २ घात २४ गुणा), त्रिष्टुप् (४३ अहर्गण) तक महर्लोक है, उसके बाद ४९ अहर्गण (४९ मरुत्) तक ब्रह्माण्ड जगत् की माप जगती छन्द में है।
वम्रि को कृषि यज्ञ का खेत में बिखरा हुआ भाग मिलता है। बीजों के जैविक खाद देने में भी उसका योगदान है।

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