हिन्द महासागर के पानी से बनी वुहान की चाय

बीते दिनों चीन के वुहान मे मोदी और शी जिंग पिंग के बीच दिखी गरमजोशी ने भले ही भारत और चीन के लोगो के मन मे आशा का संचार किया हो परंतु इस गरमजोशी के पीछे की असलियत कूटनीतिक कम भूराजनीतिक ज्यादा है. इसीलिए ये गरमजोशी नेहरू माओ के भाईचारे से कहीं ज्यादा व्यावहारिक है | हालांकि भारत के लिए चीन के प्रति अविश्वास की बर्फ को पिघलाना होगा ऐसा इसलिए नहीं कि चीन बहुत विश्वसनीय हो गया है बल्कि इसके दो कारण हैं पहला कि भारत मे अब कूटनीतिक आदर्शवाद का युग समाप्त हो गया है और दूसरा चीन इस सच से वाकिफ है कि भारत अकेला ही वन बेल्ट इनिशिएटिव प्रोजेक्ट मे पलीता लगाने मे सक्षम है |

हिमालय के उस पार बर्फ पिघलने का राज सुदूर दक्षिण के हिन्दमहासागर मे छिपा है|चीन की महत्वकांक्षी वन बेल्ट इनिशिएटिव परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है MSR यानी मैरिटाइम सिल्क रोड| MSR से जुड़े 65 देशों को आसान ऋण उपलब्ध कराने के लिए चीन ने एक ट्रिलियन डॉलर का भारी भरकम निवेश किया है| इस परियोजना का एक बड़ा हिस्सा हिन्दमहासागर से गुजरता है इस लिए चीन के लिए ये इलाका बहुत महत्वपूर्ण है| लेकिन UNCLOS यानि “समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र का समझौता” जो कहता है कि समुद्र पर किसी का एकाधिकार नही है, के बावजूद यह तथ्य है कि हिन्दमहासागर आज भी भारतीय नौसेना का अपना “मैदान” है, और इस मैदान पर वो अभी तक अजेय है|

हिन्दमहासागर के महत्व का अंदाजा सिर्फ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत के कुल क्रूड ऑइल का 80 फीसदी इसी रास्ते से आता है वहीं चीन के मध्य एशिया से आयात होने वाले क्रूड का 75 फीसदी इसी रास्ते से गुजरता है यही नहीं पूरी दुनिया के क्रूड ऑइल के व्यापार का 40 फीसदी इसी रास्ते से गुजरता है. ऐसे मे MSR मे हिन्दमहासागर के महत्व को समझा जा सकता है|

विश्व बैंक की ग्लोबल परफॉर्मेंस इंडेक्स 2016 के मुताबिक मेरीटाइम इंफ्रास्ट्रक्चर मे चीन को भारत के मुकाबले बढ़त हासिल है| हालांकि भारत सरकार बंदरगाहों मे ढांचागत सुधार के लिए सागरमाला परियोजना शुरू कर चुकी है| उधर चीन भी कथित स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स के तहत हिन्दमहासागर के तमाम देशों मे भूराजनीतिक बढ़त हासिल करने मे लगा है| यद्यपि शक्ति संतुलन मे भारत भी पीछे नही है लेकिन भारतीय जिजीविषा इस मामले मे मात खा जाती है| मालदीव दशको से भारत के प्रभावक्षेत्र वाला देश था लेकिन वो देखते देखते ड्रेगन के पंजो मे फँस गया और भारत चुपचाप देखता रहा |   चीन को आर्थिक महाशक्ति होने का भी लाभ मिलता है| दक्षिण पूर्व एशिया मे आसियान देशो के कुल व्यापार का 20 फीसदी आयात चीन से होता है वहीं भारत से कुल 2 फीसदी और ये हालत तब है जब भारत लुक ईस्ट से आगे बढ़कर एक्ट ईस्ट पर काम कर रहा है| हालांकि चीन के प्रति अविश्वास भारत को शक्ति संतुलन साधने मे मदद करता है| श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह चीन ने कब्जा लिया और उसे सौगात में मिला 8 अरब डॉलर का कर्ज, तमाम देशो को इस से सबक मिला है|

चीन ये भी जानता है कि हिन्द महासागर मे समुद्री ढाँचागत मजबूती और भूराजनीतिक बढ़त के बावजूद भारत के सहयोग के बिना MSR प्रोजेक्ट की सफलता पर सवालिया निशान लगा रहेगा|

अब वापस वुहान लौटें तो इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि चीन कूटनीति का रंगमंच तभी सजाएगा जब तक सुदूर दक्षिण मे हिन्दमहासागर भारतीय नौसेना का “मैदान” बना रहेगा, वरना ड्रैगन के दबोचने की ताकत को कौन अस्वीकार करेगा|

नितिन श्रीवास्तव 

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