ॐकार पञ्जर स्तोत्र-सरस्वती वन्दना

अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)
यह तृतीय कालिदास की रचना है। प्रथम कालिदास शुङ्ग वंश के द्वितीय राज अग्निमित्र के समकालीन थे जिनका समय भारतीय मत से (११५८-१०९८ ई.पू.) है। इनके ३ नाटक थे-अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्। मालविकाग्निमित्रम् के भरत वाक्य में आशा की है कि रक्षक अग्निमित्र के नहीं रहने पर भी प्रजा वैसे ही सुरक्षित रहेगी-
आशास्यमीति विगम प्रभृति प्रजानां, सम्पत्स्यते न खलु गोप्तरि नाग्निमित्रे। द्वितीय कालिदास उज्जैन के चक्रवर्त्ती राजा विक्रमादित्य (८२ ई.पू.-१९ ई) के आश्रित थे जिनके ३ महाकाव्य हैं-रघुवंश, कुमालसम्भव, मेघदूत। इन महाकाव्यों में कहीं भी कवि का नाम नहीं है। इसका उल्लेख केवल ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ के अन्तिम अध्याय में है जिसमें विक्रमादित्य, उनके नवरत्नों तथा अपनेपूर्व के ३ महाकाव्यों के बारे में लिखा है। विक्रमादित्य का संवत् अभी भी चल रहा है जबकि शक या संवत् नहीं जानने के कारण १९५७ का तथा कथित राष्ट्रीय शक सम्वत् अभी तक चल नहीं पाया। विक्रमादित्य का प्रभाव तथा उनका संवत् अरब तथा रोम में भी था, अतः अंग्रेज उनको काल्पनिक कहते हैं। कुछ बहाना बना कर कहते हैं कि ११०० ई, में किसी दूसरे ने ग्रन्थ लिख कर उसे कालिदास के नाम पर कर दिया। सामान्यतः लोग दूसरे की कीर्ति अपने नाम से करते हैं, पर भारईय ग्रन्थों को झूठा कहने के लिए उलटा बहाना बनाते हैं। कलियुग के ३००४ वर्ष बाद ऋतु चक्र १.५ मास पीछे हट गया था जिसके कारण राशि चक्र में संशोधन कर विक्रमादित्य ने नया संवत्सर चलाया। यह ऋतु चक्र के अनुसार चान्द्र वर्ष में संशोधन था (शुक्ल के बदले कृष्ण पक्ष से मास आरम्भ), अतः कलि वर्ष के बाद इसेही संवत् कहा गया। बाकी सभी वर्ष शक हैं। यह संशोधन नहीं समझने के कारण ज्योतिर्विदाभरण की महापात गणना ११०० ई. की लगती है। ज्योतिर्विदाभरण में विक्रमादित्य द्वारा जुलियस सीजर की पराजय तथा बन्दी बनाना (जिसे रोमन इतिहासकारों ने ६ मास अज्ञात काल कहा-विल डुरण्ट), नवरत्नों के नाम तथा ग्रन्थ का निर्माण काल दिया है।
ज्योतिर्विदाभरण, ग्रन्थाध्याय निरूपणम् २२ विक्रमार्क वर्णनम्-
वर्षे श्रुतिस्मृतिविचारविवेकरम्ये श्रीभारते खधृतिसम्मितदेशपीठे।
मत्तोऽधुना कृतिरियं सति मालवेन्द्रे श्रीविक्रमार्कनृपराजवरे समासीत् ॥ २२.७ ॥
शाकप्रवृत्तिकाल-
येनास्मिन्वसुधातले शकगणान्सर्वा दिशः सङ्गरे हत्वा पञ्चनवप्रमान्कलियुगे शाकप्रवृत्तिः कृता।
श्रीमद्विक्रमभूभुजा प्रतिदिनं मुक्तामणिस्वर्णगो सप्तीभाद्यपवर्जनेन विहितो धर्मः सुवर्णाननः ॥ २२.१३ ॥
दिग्विजयवर्णनम्-
उद्दामद्रविडद्रुमैकपरशुर्लाटाटवीपावको, वेल्लद्वङ्गभुजङ्गराजगरुडो गौडाब्धिकुम्भोद्भवः।
गर्जद् गुर्जरराजसिंधुरहरिर्धारान्धकारार्यमाः, काम्बोजाम्बुजचन्द्रमा विजयते श्रीविक्रमार्को नृपः ॥ २२.१४ ॥
प्रभुत्ववर्णनम्-
येनाप्युग्रमहीधराग्रविषये दुर्गाण्यसह्यान्यहो, नीत्वा यानि नतीकृतास्तदधिपाः दत्तानि तेषां पुनः।
इन्द्राम्भोध्यमरद्रुमस्मरसुरक्ष्माभृद् गणेनाञ्जसा, श्रीमद्विक्रमभूभृताखिलजनाम्भोजेन्दुना मण्डले ॥ २२.१५ ॥
उज्जयिनीवर्णनम्-
यो रुक्मदेशाधिपतिं शकेश्वरं जित्वा गृहीत्वोज्जयिनीं महाहवे।
आनीय सम्भ्राम्य मुमोच यत्त्वहो स विक्रमार्कः समसह्यविक्रमः ॥ २२.१७ ॥
काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततो ननु कियच्छ्रुतिकर्मवादः।
ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो हि ततो बभूव ॥ २२.२० ॥
वर्षैः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणैर्याते कलौ (३०६८ कलि) सम्मिते, मासे माधवसंज्ञिके च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः।
नानाकालविधानशास्त्रगदितज्ञानं विलोक्यादरा-दूर्जे ग्रन्थसमाप्तिरत्र विहिता ज्योतिर्विदां प्रीतये ॥ २२.२१ ॥
तृतीय कालिदास तान्त्रिक थे तथा पूर्णा उनकी कुलदेवी थी-उसी के निकट उनका स्थान रहा होगा (उनकी पुस्तक चिद्गगन चन्द्रिका)। वे उज्जैन के भोजराज (उस क्षेत्र के सभी राजा भोज थे, जैसे रघुवंश में अज की पत्नी इन्दुमती को भोज कन्या कहा है) के आश्रित थे। बल्ख पर भोज की चढ़ाई के समय वे साथ थे तथा मुहम्मद से भेंट हुई थी (भविष्य पुराण)। इनके तन्त्र ग्रन्थ तथा आशु काव्य हैं। इन्ही की सरस्वती वन्दना भी है।
चिद्गगनचन्द्रिका-इह कालिदासचन्द्रप्रसूतिरानन्दिनी स्तुतिर्व्याजात्।
चिद्गगनचन्द्रिकाब्धेः समयतु संसारदावदवथुं वः॥३॥
यः शिवात् प्रभृति सोम पश्चिमस्त्वत्क्रमैकरसिको गुरुक्रमः।
आननाग्रमिह चक्रभानुतो यस्त्वमेतदुभयं त्वया यया॥३००॥
तत्तदर्थ पुरुषोद्धृत क्रमः प्रातिभ स्फुरित दिव्य विग्रहम्।
अक्रमस्तव वरं पदं शिवे योऽहमद्वय विमर्श लक्षणः॥३०१॥
लक्षणन्तदनु सूक्ष्ममिष्यते ज्योतिरात्मक मवर्णमास्थिता।
स्थूलमेतदनुवर्ण्य लक्ष्यते भाव्यतो शमयितुं मनोमया॥३०२॥
तत्र शान्तवति पौरुषो मल व्योमवद्गतमवेदया त्वया।
सिद्धकार्य करणं निरंकुशं चिन्मरीचिविसरेण मंगले॥३०३॥
सोमपुत्रमपनेष्य मद्गतस्त्वत्क्रमोऽद्य किमपिस्तुतो मया।
ग्रस्तभीषणभवोऽयमम्बिके त्वत्पदाम्बुज विमर्ष तेजसा॥३०४॥
मुक्तमेव न मया मयोचितः प्रेरितोऽस्मि तव तर्त्तिनी त्वया।
सिद्धनाथ कृततत्क्रमस्तुतेः कालिदास रचितां च पञ्चिकाम्॥३०५॥
यद् विनिश्चयपद च ते स्तवं योऽम्ब वेद कुरु तन्मुखं जगत्।
कालिदास पदवीं तवाश्रितः त्वत्प्रसादकृतवाग्विजृम्भणः॥३०६॥
त्वद्गुणान्यदहमस्तु वै जगत् तेन मोहमतिरद्य मुच्यताम्।
पूर्णपीठमवगम्य मङ्गले त्वत्प्रसादमकृते मया कृतः॥३०७॥
यहां कवि ने अपनी पदवी कालिदास कही है तथा साधना स्थान पूर्णपीठ (महाराष्ट्र के विदर्भ में) कहा है।
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ३, अध्याय ३-
शालिवाहन वंशे च राजानो दश चाभवन्। राज्यं पञ्चशताब्दं च कृत्वा लोकान्तरं ययुः॥१॥
भूपतिर्दशमो यो वै भोजराज इति स्मृतः॥ दृष्ट्वा प्रक्षीण मर्य्यादां बली दिग्विजयं ययौ॥२॥
सेनया दशसाहस्र्या कालिदासेन संयुतः। तथान्यैर्ब्राह्मणैः सार्द्धं सिन्धुपारमुपाययौ॥३॥
जित्वा गान्धारजान् म्लेच्छान् काश्मीरान् आरवान् शठान्। तेषां प्राप्य महाकोषं दण्डयोग्यानकारयत्॥४॥
एतस्मिन्नन्तरे म्लेच्छ आचार्य्येण समन्वितः। महामद इति ख्यातः शिष्य शाखा समन्वितः॥५॥
नृपश्चैव महादेवं मरुस्थल निवासिनम्। चन्दनादिभिरभ्यर्च्य तुष्टाव मनसा हरम्॥६॥
इति श्रुत्वा स्तवं देवः शब्दमाह नृपाय तम्॥९॥ महामद इति ख्यातः पैशाच कृति तत्परः॥१२॥
इति श्रुत्वा नृपश्चैव स्वदेशान् पुनरागमत्। महामदश्च तैः सार्द्धं सिन्धुतीरमुपाययौ॥१४॥
उवाच भूपतिं प्रेम्णा मायामद विशारदः। तव देवो महाराज मम दासत्वमागतः॥१५॥
तच्छ्रुत्वा कालिदासस्तु रुपा प्राह महामदम्। माया ते निर्मिता धूर्त नृपमोहनहेतवे॥१८॥
हनिष्यामि दुराचारं वाहीकं पुरुषाधमम्। इत्युक्त्वा स द्विजः श्रीमान्नवार्णजपतत्परः॥१९॥
पैशाच देहमास्थाय भोजराजं हि सोऽब्रवीत्॥२३॥ ईशाज्ञया करिष्यामि पैशाचं धर्मदारुणम्॥२४॥
लिंगच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी स दूषकः। उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम॥२५॥
विना कौलं च पशवस्तेषां भक्ष्या मता मम। मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति॥२६॥
तस्मान् मुसलवन्तो हि जातयो धर्मदूषकाः। इति पैशाच धर्मश्च भविष्यति मया कृतः॥२७॥
सरस्वती वन्दना है।
ओङ्कार पञ्जर. राग-मालिका. आदि ताल।
(रागा: मध्यमावति)
ओङ्कार पन्जर शुकीम्-उपनिषद्-उद्यान केलि कलकण्ठीम्।
आगम विपिन मयूरी-मार्यामन्तर्-विभावये गौरीम्॥१॥
अर्थ- ॐकार पिंजड़ा है जिसमें सरस्वती सुग्गी के समान हैं। उपनिषद् रूपी उद्यान की कोयल हैं तथा आगम (तन्त्र, वेद भी-परम्परा से प्राप्त साहित्य) रूपी विपिन (वन) की मयूरी हैं। उनका ध्यान भीतर में गौरी के रूप में करता हूं।
टिप्पणी-वाणी के ४ पद हैं जिनमें ३ गुहा में हैं तथा चतुर्थ पद कथन या लेखन में निकलता है। भीतर के ३ पद गौरी (ग= तीसरा व्यञ्जन) हैं-परा, पश्यन्ती, मध्यमा। बाहर व्यक्त या वैखरी वाणी में कुछ लुप्त हो जाता है अतः उसे तम कहते हैं। गौ तथा तम का सम्बन्ध गौतम का न्याय दर्शन है।
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥ (ऋग्वेद १/१६४/४५)
परायामङ्कुरीभूय पश्यन्त्यां द्विदलीकृता ॥१८॥
मध्यमायां मुकुलिता वैखर्या विकसीकृता॥ (योगकुण्डली उपनिषद् ३/१८, १९)
अक्षरं परमो नादः शब्दब्रह्मेति कथ्यते। मूलाधारगता शक्तिः स्वाधारा बिन्दुरूपिणी॥२॥
तस्यामुत्पद्यते नादः सूक्ष्मबीजादिवाङ्कुरः। तां पश्यन्तीं विदुर्विश्वं यया पश्यन्ति योगिनः॥३॥
हृदये व्यज्यते घोषो गर्जत्पर्जन्यसंनिभः। तत्र स्थिता सुरेशान मध्यमेत्यभिधीयते॥४॥
प्राणेन च स्वराख्येन प्रथिता वैखरी पुनः। शाखापल्लवरूपेण ताल्वादिस्थानघट्टनात्॥५॥ (योगशिखोपनिषद् ३/२-५)
(राग-आनन्दभैरवि)
दयमान दीर्घ नयनाम् देशिक रूपेण दर्शिताभ्युदयाम्।
वामकुच निहित वीणाम् वरदाम् संगीत मातृकाम् वन्दे॥२॥
अर्थ-सरस्वती दया-युक्त हैं, दीर्घ नयन वाली हैं। दैशिक (या देशिक, जो दिशा दिखाये, गुरु) रूप में अभ्युदय का मार्ग दिखाया है। वाम स्तन पर वीणा है तथा सभी संगीत की मातृका (वर्णमाला) हैं।
टिप्पणी-अभ्युदय = धर्ममार्ग, निःश्रेयस = मोक्ष। मीमांसा दर्शन के आरम्भ में धर्म की परिभाषा है-कि इससे अभ्युदय और निश्श्रेयस होता है। अथ धर्मानुशासनम्।१। यतोऽभ्युदय निःश्रेयसः॥२॥
वर्णों से सभी प्रकार के शब्द-वाक्य आदि से युक्त साहित्य बनते हैं, अतः इसे मातृका (माता समान) कहा गया है।
(राग-काम्भोजि)
श्याम तनु सौकुमार्याम् सौन्दर्यानन्द सम्पदुन्मेषाम्।
तरुणिम करुणापुराम् मदजल कल्लोल लोचनाम् वन्दे॥३॥
अर्थ-सरस्वती का श्याम तनु सुकुमार (कोमल) है, सौन्दर्य आनन्द की सम्पत्ति का उन्मेष (आरम्भ) है। तरुणी तथा करुणा का पुर (नगर, रचना) हैं। मद जल के कल्लोल (तरङ्ग) जैसे चञ्चल नेत्र हैं। ऐसी सरस्वती की वन्दन करता हूँ।
टिप्पणी-सरस्वती को प्रायः शुक्ल कहा जात है। यहां उनको श्याम तनु कहा गया है। प्रथम श्लोक की टिप्पणी में कहा है कि गुहा के भीतर वाणी के ३ पद गो या गौरी वाक् हैं। बाहर व्यक्त होने वाली वाणी में कुछ लुप्त हो जाता है, अतः उसे तम कहते हैं। यही तम को श्याम तनु कहा गया है।
चण्डी पाठ के भी महासरस्वती चरित्र के आरम्भ के अध्याय ५ के ध्यान में कहा है-गौरी देह समुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा, पूर्वामत्र सरस्वतीं अनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
इसी अध्याय में कहा है कि शरीर कोष रूपी देवी गौरी हैं, उससे अलग देवी कालिका (कृष्णा) हैं। अर्थात् मस्तिष्क गुहा (शरीर कोष) की वाणी गौरी हैं।
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका। कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते॥८७॥
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती। कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥८८॥
(राग-कल्याणि)
नख मुख मुखरित वीणानाद रसास्वाद नव नवोल्लासम्।
मुखमम्ब मोदयतु माम् मुक्ता ताटङ्क मुग्ध हसितम् ते॥४॥
अर्थ-नख तथा मुख से मुखरित वीणा नाद के रस स्वाद से नया नया उल्लास होता है। नख से वीणा के तार बजते हैं, मुख से वैसे ही राग की ध्वनि निकलती है। हे माता! आपकी मोहक हास्य तथा चञ्चल (मुक्त) ताटङ्क से मुझे आनन्द मिले।
(राग-मायामालवगौड़)
सरिगम पद निरताम् ताम् वीणा सन्क्रान्त कान्त हस्ताम् ताम्।
शान्ताम् मृदुल स्वान्ताम् कुचभारनतान्ताम् नमामि शिवकान्ताम्॥५॥
अर्थ-सरिगम (संगीत स्वर) के पद में निरत हैं या (सरिगमपदनि) में रत हैं, हाथों में वीणा से स्वर निकल रहे हैं। बाहर ध्वनि निकल रही है, किन्तु भीतर से शान्त और मृदुल हैं। ऐसी शिवकान्ता (शिव पत्नी) को नमस्कार है जिनका शरीर स्तन के भार से थोड़ा झुका हुआ है।
टिप्पणी-संगीत के स्वर हैं-षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद। इनमें प्रथम ४ स्वरों के प्रथम अक्षरों से सरिगम या सरगम बना है।
(राग-मोहन)
अवटुतट घटितचूली ताडित ताली पलाश ताटङ्काम्।
वीणा वादन वेला कम्पित शिरसम् नमामि मातङ्गीम्॥६॥
अर्थ्-वटु (छात्र) को सरस्वती के पास जाने पर और किसी तट (आश्रय) की जरूरत नहीं होती। वह चूली (चूल = चोटी) अर्थात् शिखर पर पहुंच जाता है। ताली (ताल =संगीत का स्वर) अर्थात् संगीत शिक्षा की मूल हैं। पलास (वेद) रूपी ताटङ्क (कान का कुण्डल) है। मातङ्ग (१० वीं महाविद्या, रामायण काल के एक ऋषि की कन्या रूप में) की कन्या रूप में हैं।
टिप्पणी-वट वृक्ष गुरु शिष्य परम्परा का प्रतीक है अतः वह आदि गुरु शिव का चिह्न है। जैसे वट वृक्ष की शाखा जमीन से लग कर उसी के जैसा वृक्ष बन जाती है, उसी प्रकार गुरु शिष्य को अपना ज्ञान देकर अपने जैसा बना देता है। (दक्षिणामूर्ति स्तोत्र का अन्तिम श्लोक)। अतः शिष्य को वटु कहते हैं। वट के मूल द्रुम से जो अन्य द्रुम निकलते हैं, उनको दुमदुमा कहते हैं-सोमनाथ में दुमियाणी, भुवनेश्वर में दुमदुमा, कोलकाता के दक्षिणेश्वर के निकट दुमदुमा (दमदम हवाई अड्डा), कामाख्या के निकट दुमदुमा (बंगलादेश सीमा पर), वैद्यनाथ धाम का दुमका।
मुण्डकोपनिषद् के अनुसार मूल अथर्व वेद से ३ अन्य शाखायें निकलीं-ऋक्, यजु;, साम, जैसे पलास की टहनी से ३ पत्ते निकलते हैं (फिर वही ढाक के ३ पात)। अतः पलास ब्रह्मा या वेद का चिह्न है। शाखा निकलने से मूल नष्ट नहीं होता, अतः त्रयी का अर्थ ४ वेद होते हैं, १ मूल + ३ शाखा।
मतङ्ग का अर्थ हाथी भी होता है। व्यक्त वैखरी वाणी स्थूल है अतः उसे मतङ्ग भी कहते हैं। वह सुनने पर शुद्ध अर्थ सरस्वती की कृपा से ज्ञात होता है।
(राग-भैरवि)
वीणा रवानुषङ्गम् विकच मदामोद माधुरी भृङ्गम्।
करुणा पूरतरङ्गम् कलये मातङ्ग कन्यकापाङ्गम्॥७॥
अर्थ-वीणा रव (ध्वनि) के साथ हैं। अर्थों के मूल में पहुंचने वाली (वि-कच = बिना केश का, बाल की खाल निकालना)। शास्त्र-माधुरी का आनन्द लेने वाली भृङ्ग (भ्रमर) हैं। वह करुणा की तरङ्ग से भरी तथा उससे विचलित (कलये) हैं। मातंग मुनि की कन्या रूप में अपाङ्ग (तिरछे नेत्र वाली हैं)।
(राग-सिंहेन्द्रमध्यम)
मणि भङ्ग मेचकाङ्गीम् मातङ्गीम् नौमि सिद्ध मातङ्गीम्।
यौवन वन सारङ्गीम् संगीताम्भोरुहानुभव भृङ्गीम्॥८॥
अर्थ-मेचक (मयूर जैसा नील वर्ण) अङ्ग वाली, मणिबन्ध (कटि या करमूल) को झुकाये हुयी मातङ्गी है। ऐसी सिद्ध मातङ्गी को नमस्कार। वे यौवन वन की हरिणी (सारङ्गी) हैं तथा संगीत रूपी कमल की भ्रमर हैं।
(राग-सुरटि)
मेचकमासेचनकम् मिथ्या दृष्टान्त मध्य भागम् ते।
मातस्तव स्वरूपम् मङ्गल सङ्गीत सौरभम् वन्दे॥९॥
अर्थ-मनोहर श्याम शरीर वाली, मध्य कटि भाग के मिथ्या दृष्टान्त वाली माता को नमस्कार जो स्वयं संगीत सौरभ का मङ्गल रूप हैं।
टिप्पणी-सरस्वती जगत् माता हैं। विशाल जगत् उनके मध्य भाग (उदर, कटि) से उत्पन्न हुआ है, जिसे बहुत सूक्ष्म कहा है। इतनी छोटी कटि से विशाल जगत् होना मिथ्या लगता है। पण्डितराज जगन्नाथ ने भी लक्ष्मी वन्दना में कहा है कि उनकी पतली कटि से जगत् की उत्पत्ति कही गयी है, इसी से विश्वास हुआ कि जगत् मिथ्या है (ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या)।
जगन्मिथ्याभूतं मम निगदतां वेदवचसाम्, अभिप्रायो नाद्यावधि हृदय मध्याविशदयम्।
इदानीं विश्वेशां जनकमुदरं ते विमृशतो, विसन्देहं लग्नेयं सुगतमतसिद्धान्तसरणिः॥
(लक्ष्मी लहरी, १८)
अर्थ-वेद में कहा है कि जगत् मिथ्या है। अभी तक मुझे इस पर विश्वास नहीं हुआ था। किन्तु पूरे विश्व के जनक रूप में गरुडध्वज की प्रियतमा का उदर देख कर सन्देह दूर हो गया। इतने छोटे उदर में विशाल विश्व कैसे हो सकता है?
माणिक्य वीणामुपलालयन्तीं मदालसां मञ्जुलवाग्विलासाम्।
माहेन्द्रनीलद्युतिकोमलाङ्गीं मातङ्गकन्यां सततं स्मरामि॥
अर्थ-माणिक्य की वीणा को गोद में रख कर बजा रही हैं (उपलालयन्तीम्)। मञ्जुल वाणी के विलास में मग्न या मदमस्त हैं। उनकी शोभा माहेन्द्र-नील है, तथा कोमल अंग हैं। ऐसी मातंग कन्या का मैं सतत् स्मरण करता हूं
टिप्पणी-सामान्यतः गौरी वाक् के रूप में सरस्वती को सदा गौरी कहा गया है। किन्तु व्यक्त वाणी तम है, अतः इस रूप में नील वर्ण का कहा गया है।
पूर्व तट का पर्वत महेन्द्र पर्वत है, ओडिशा के फूलबानी से आन्ध्र के राजमहेन्द्री तक। रामायण में रामेश्वरम तक महेन्द्र पर्वत कहा गया है। उसके निकट जगन्नाथ का स्थान नीलाचल कहलाता है। उनकी या कृष्ण की जैसी श्याम शोभा है, वैसी हई मातङ्गी रूप में सरस्वती की शोभा है।

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