ब्रह्म के स्थान

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-

मनुष्य ब्रह्मा कई थे, उनके स्थान तथा समय भी भिन्न-भिन्न हैं। इसमें भ्रम के कई कारण हैं।
(१) ध्रुवीय २ मेरु के अतिरिक्त हर महाद्वीप में सुमेरु हैं, जहां ब्रह्मा का निवास कहा जाता है।
(२) उनका एक स्थान प्राग्ज्योतिषपुर है। इस नाम के भी २ प्रसिद्ध स्थान थे।
(३) पुष्कर नाम के २ प्रसिद्ध नगर थे। मूल पुष्कर उज्जैन से १२ अंश पश्चिम था। एक अन्य पुष्कर राजस्थान के अजमेर में है जो इन्द्रप्रस्थ का पुष्कर था। इनकी विपरीत दिशा में पुष्कर द्वीप था, जो वर्तमान दक्षिण अफ्रीका है।
(४) ब्रह्मा की कान्तिमती पुरी सुमेरु या उसके निकट थी।
(५) महाभारत, पर्व, अध्याय ३४८-३४९ में ७ मनुष्य ब्रह्मा के काल तथा स्थान का उल्लेख नहीं है।
ब्रह्मा के स्थान-
(१) पुष्कर के ब्रह्मा-
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत मूर्ध्नो विश्वस्य वाधतः।
तमु त्वा दध्यङ् ऋषिः पुत्र ईधे अथर्वणः वृत्रहणं पुरन्दरम्॥
(ऋक्, ६/१६/१३-१४)
पद्म पुराण, अध्याय (१/१५)-
अहं यत्र समुत्पन्नः पद्मं तद्विष्णु-नाभिजम्।
पुष्करं प्रोच्यते तीर्थमृषिभिर्वेदपाठकैः॥२०॥
पद्म पुराण में पुष्कर का सबसे अधिक वर्णन है। ज्येष्ठ, मध्यम तथा कनिष्ठ-३ पुष्कर कहे गये हैं। ज्येष्ठ तथा मध्यम पुष्कर के मध्य में पश्चिमोन्मुखी सरस्वती तथा उदङ्मुखी गङ्गा का संगम है।
ज्येष्ठ-मध्यमयोर्मध्ये संगमो लोकविश्रुतः॥११२॥
पश्चान्मुखी ब्रह्मसुता जाह्नवी तु उदङ्मुखी।
(पद्म पुराण, १/३२/११२)
यह पुष्कर उज्जैन से १२ अंश पश्चिम था, अर्थात् सूर्य उज्जैन के १ मुहूर्त बाद वहां पहुंचते थे।
एवं पुष्कर मध्येन यदा याति दिवाकरः॥२८।
त्रिंशद् भागं तु मेदिन्याः तदा मौहूर्तिकी गतिः॥
(विष्णु पुराण, २/८, मत्स्य पुराण, १२४/४०)
उज्जैन प्राचीन काल का शून्य देशान्तर था, अभी ग्रीनविच से ७५०४३’ पूर्व है। उससे १२ अंश पश्चिम वाले पुष्कर को बुखारा कहते हैं जो ६४०२६’ पूर्व तथा ३९०४६’ उत्तर है। यह प्राचीन ईरान में था अभी उजबेकिस्तान में है। वर्तमान स्थान से थोड़ा दक्षिण दिन का महत्तम मान १६ घंटा होता है जैसा वेदांग ज्योतिष में लिखा है-
घर्मवृद्धिरपां प्रस्थः क्षपाह्रास उदग्गतौ।
दक्षिणे तौ विपर्यस्तौ षण्मुहूर्त्ययनेन तु॥
(ऋक् ज्योतिष, ७, याजुष ज्योतिष, ८)
अर्थात् सूर्य दक्षिण दिशा में होने पर रात्रि में ह्रास होता है और उसका दिन से अन्तर ६ मुहूर्त का होता है। दिन + रात्रि = ३० मुहूर्त, दिन १८, रात्रि १२ मुहूर्त।
(२) पुष्कर द्वीप के ब्रह्मा-एक ब्रह्मा पुष्कर द्वीप में भी थे, जो वर्तमान दक्षिण अमेरिका है। यहां कुस्को (स्थानीय भाषा कुस्कू) से ४ दिशाओं में राज मार्ग जाते थे जैसे चतुर्मुख ब्रह्मा के स्थान से जाते थे। इसके पूर्व भाग में माचू-पिक्चू का स्थानीय भाषा में अर्थ है-वृद्ध का पिरामिड। कुकू के पश्चिम में लीमा के पिरामिड हैं जिनको हुआका-पुक्लाना कहते हैं। स्थानीय भाषा में इसे वाका देवी (वाग्देवी) का स्थान कहते हैं तथा यहां यज्ञ वेदी है। सम्भवतः यही पुष्कर द्वीप का न्यग्रोध था। यह उज्जैन से प्रायः १५६ अंश पश्चिम है। पुष्कर द्वीप में २ ही खण्ड कहे गये हैं-महावीर और धातकि, जो वर्ष पर्वत मानसोत्तर (ऐण्डीज) से विभाजित हैं। इसके वल (उत्तर में) से घिरा भाग (पूर्वमें ब्राजील, अर्जेण्टीना आदि) धातकि हैं, और बाहरी भाग महावीर है। यहां के न्यग्रोध में ब्रह्मा का निवास था। न्यग्रोध का शाब्दिक अर्थ वट-वृक्ष है। यह निम्न या दक्षिण गोल का पुष्कर होने से न्यग्रोध था।
पुष्करे सवनस्यापि महावीरोऽभवत् सुतः।
धातकिश्च तयोस्तत्र द्वे वर्षे नाम चिह्निते॥७४॥
महावीरं तथैवान्यद् धातकी-खण्ड संज्ञितम्।
एकश्चात्र महाभाग प्रख्यातो वर्ष पर्वतः॥७५॥
मानसोत्तर संज्ञो वै मध्यतो वलयाकृतिः॥७६॥
पुष्करद्वीप वलयं मध्येन विभजन्निव॥७७॥
महावीरं बहिर्वर्षं धातकी खण्डमन्ततः॥८१॥
न तत्र नद्यः शैला वा द्वीपे वर्षद्वयान्विते॥८२॥
(चिली मरुभूमि)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम्।
तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुरैः॥८६॥
यही वर्णन कूर्म पुराण (१/५०/१-१०), ब्रह्म पुराण (१८/७४-८८), मत्स्य पुराण (१२३/१३-२०,३९), वायु पुराण (४९/१०४-१२१, १३५), भागवत पुराण(५/२०/२९-३२) में है।
यह निम्न पुष्कर ही महादेव का पुष्कर है-
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे तत्रत्यैः सनमस्कृतः॥१४०॥
महादेवः पूज्यते तु ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः।
तस्मिन्निवसति ब्रह्मा साध्यः सार्द्धं प्रजापतिः॥१४१॥
(ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/१९/१४०-१४१, वायु पुराण, ४९/१३५-१३६)
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे पद्मवत् तेन स स्मृतः।
पूज्यते स महादेवैर्ब्रह्मांशोऽव्यक्त सम्भवः॥
(मत्स्य पुराण, १२३/३९)
(३) प्राग्ज्योतिष पुर-दो प्राग्ज्योतिष पुर थे-एक भारत (मुख्य खण्ड) की पूर्व सीमा जहां सूर्योदय पहले होता था। दूसरा भारत के मध्य उज्जैन से ९० अंश पश्चिम जो असुर भाग की पूर्व सीमा थी। पश्चिम में सीता की खोज के लिये यहां तक जाने के लिये सुग्रीव ने वानरों को भेजा था। रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४२-
चतुर्भागे समुद्रस्य चक्रवान्नाम पर्वतः।
तत्र चक्रं सहस्रारं निर्मितं विश्वकर्मणा॥२७॥
तत्र पञ्चजनं हत्वा हयग्रीवं च दानवम्।
आजहार ततश्चक्रं शङ्खं च पुरुषोत्तमः॥२८॥
तत्र प्राग्ज्योतिषं नाम जातरूपमयं पुरम्।
यस्मिन्वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः॥३१॥
यस्मिन्हरिहयः श्रीमान्माहेन्द्रः पाकशासनः।
अभिषिक्तः सुरै राजा मेघवान्नाम पर्वतः॥३५॥
ब्रह्म पुराण (अध्याय ९३ या २०२)-
भौमोऽयं नरको नाम प्राग्ज्योतिषपुरेश्वरः॥८॥
छत्रं यत् सलिलस्रावी तज्जहार प्रचेतसः।
मन्दरस्य तथा शृङ्गं हृतवान् मणिपर्वतम्॥१०॥
भागवत पुराण (८/५९/२-६) में भी समुद्र के भीतर भौमासुर के दुर्ग का उल्लेख है। प्राग्ज्योतिष पुर की राजधानी लोहे आदि के घेरे से सुरक्षित रहने के कारण उसका नाम मुर था (मुर या मुर्रम = लौह अयस्क)-
हृतोऽमराद्रिस्थानेन ज्ञापितो भौमचेष्टितम्॥२॥
स भार्योगरुडारूढः प्राग्ज्योतिषपुरं ययौ।
गिरिदुर्गैः शस्त्रदुर्गैर्जलान्यनिलदुर्गमम्।
मुरपाशायुतैर्घोरैर्दृढैः सर्वत आवृतम्॥३॥
मुरः शयान उत्तस्थौ दैत्यः पञ्चशिरा जलात्॥६॥
मत्स्य पुराण, अध्याय ११४ में भारत के पूर्व दिशा के देशों में प्राग्ज्योतिषपुर का उल्लेख है-
एते देश उदीच्यास्तु प्राच्यान् देशान्निबोधत॥४४॥
अङ्गा वङ्गा मद्गुरका अन्तर्गिरिर्बहिर्गिरी।
ततः प्लवङ्गमातङ्गा यमका मालवर्णकाः।
सुह्मोत्तराः प्रविजया मार्गवागेय मालवाः॥४५॥
प्राग्ज्योतिषाश्च पुण्डाश्च विदेहास्ताम्रलिप्तका।
शाल्वमागधगोनर्दाः प्राच्या जनपदाः स्मृताः॥४६॥
भगदत्त भी २ कहे गये हैं। महाभारत, सभा पर्व, अध्याय १४ में उनको पश्चिम दिशा में यवनाधिपति तथा मुर और नरकदेश का शासन करने वाला कहा है-
मुरं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः।
अपर्यन्त बलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा॥१४॥
भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितुः सखा।
स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः॥१५॥
सभा पर्व अध्याय २६ में भारत के पूर्वी भाग के राजा तथा चीन और समीपवर्ती द्वीपों का भी अधिपति और इन्द्र का मित्र कहा गया है-
शाकल द्वीप वासाश्च सप्त द्वीपेषु ये नृपाः।
अर्जुनस्य च सैन्यैस्तैर्विग्रहस्तुमुलोऽभवत्॥६॥
स तानपि महेष्वासान् विजिग्ये भरतर्षभ।
तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत्॥७॥
तत्र राजा महानासीद् भगदत्तो विशाम्पते।
तेनासीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः॥८॥
स किरातैश्च चीनैश्च वृतः प्राग्ज्योतिषोऽभवत्।
अन्यैश्च बहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः॥९॥
उपपन्नं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन।
पाकशासन दायादे वीर्यमाहव शोभिनि॥११॥
अहं सखा महेन्द्रस्य शक्रादनवरो रणे।
न शक्ष्यामि च ते तात स्थातुं प्रमुखतो युधि॥१२॥
जगद्गुरु वैभवम् (४/२-३) में सुमेरु पर्वत पर स्थित प्राग्ज्योतिष पुर में ब्रह्मा की कन्तिमती सभा कहा है। यह सुमेरु भारत के पश्चिमोत्तर भाग का पामीर या प्राङ्-मेरु (पूर्वी मेरु) है। यहां प्राग्ज्योतिषपुर का उल्लेख नहीं है-
श्री निधानं पुरं मेरोः शिखरे रत्न चित्रितम्॥३॥
वैराजं नाम भवनं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥९॥
सभा कान्तिमती नाम देवानां शर्मदायिका॥।१३॥(पद्म पुराण, १/१५)
यही वर्णन स्कन्द पुराण (५/१/१/१२,१७,२१) में है।
वायु तथा वराह पुराण में इसे मनोवती कहा है-
अव्यक्त पृथिवी पद्मं मेरुस्तस्य च कर्णिका॥३८॥
तस्मिन् पद्मे समुत्पन्नो देवदेवश्चतुर्मुखः॥४४॥
तस्य बीज निसर्गं हि पुष्करस्य यथार्थवत्॥४५॥
तत्र ब्रह्म सभा रम्या ब्रह्मर्षि जन सङ्कुला।
नाम्ना मनोवती सा तु सर्वलोकेषु विश्रुता॥६६॥
(वराह पुराण, अध्याय ७५)
वायु पुराण (३४/४१,४२, ७२) में भी यही है।
पूर्वभारत का प्राग्ज्योतिषपुर एक ब्रह्मा का निवास था। यहां विष्णु का नाभि क्षेत्र मणिपुर है (शरीर के भीतर नाभि स्थान का चक्र), ब्रह्मपुत्र नदी तथा उसका स्रोत क्षेत्र ब्रह्म-विटप, मणिपुर के पूर्व ब्रह्म देश आदि हैं।
अन्य ब्रह्मा के स्थान-
(१) स्वायम्भुव मनु (२९१०२ ईपू)-इनके २६,००० वर्ष बाद बादरायण व्यास के समय ३१०२ ईपू. में कलियुग का आरम्भ हुआ (ब्रह्माण्ड पुराण,१/२/२९/१९, मत्स्य पुराण, २७३/७७-७८)। वेद तथा अन्य शास्त्रों का आरम्भ इनसे हुआ। ये आद्य त्रेता में हुए थे (वायु पुराण, ३१/३)। ये अयोध्या में रहते थे। इनके पौत्र ध्रुव ने मथुरा (मधुवन) में तपस्या की थी तथा उत्तर में कुबेर के यक्षों से युद्ध किया था (भागवत पुराण, स्कन्ध ४, अध्याय ८-१२)।
(२) कश्यप (१७५०० ईपू.)-इनके १०युग = ३६०० वर्ष बाद १३९०२ ईपू. में वैवस्वत मनु काल था। उनके बाद सत्य, त्रेता, द्वापर ३१०२ई.पू. में पूर्ण हुए। कश्यप के कई अर्थ और स्थान हैं। दृश्य जगत की सबसे बड़ी रचना ब्रह्माण्ड को काश्यपी पृथ्वी कहते हैं। कश्यप नाम के कई ऋषि हुए हैं। यहां द्वितीय व्यास के विषय में कहा जा रहा है। ये देवो, असुर मनुष्यों के अधिपति रूप में प्रजापति या ब्रह्मा कहे गये हैं (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/१/५३ में प्रजापति, ब्रह्माण्ड, २/३/७१/२३८, मत्स्य, ४९/७ में ब्रह्मा)। एक मत है कि ये दहर एशिया (एशिया माइनर) में रहते थे जो देव, असुर, दानव क्षेत्रों का सन्धि-स्थल था। नीलमत पुराण तथा लक्ष्मीनारायण संहिता (२/१०४/२५) के अनुसार ये कश्मीर में थे तथा कश्यप-मेरु से कश्मीर हुआ है। पर इनकी शोध संस्था वैकंक पर्वत (थाइलैण्ड की राजधानी बैंगकाक) तथा मणि पर्वत के बीच चम्पक वन (वियतनाम का प्राचीन चम्पा राज्य) में थी-
विकङ्कस्याचलेन्द्रस्य मणिशैलस्य चान्तरे।
शतयोजन विस्तीर्णं द्वियोजन शतायतम्॥१६॥
विपुलं चम्पकवनं सिद्ध चारण सेवितम्॥१७॥
तत्राश्रमं भगवतः कश्यपस्य प्रजापतेः।
सिद्ध साध्य गणाकीर्णं नानाश्रुति विभूषितम्॥२२॥
(वायु पुराण, ३७/१६-२२)
(३) अपान्तरतमा- अपान्तरतमा का जन्म वाणी से हुआ था (महाभारत, शान्ति पर्व, ३४८/१९-२४, ३४९/३९-५२) उनके माता पिता के लिये वाणी-हिरण्यगर्भाय नमः यज्ञ में पाठ होता है। इन्होंने त्रिसुपर्ण ऋषि को वेद का उपदेश दिया तथा वेदों का विभाजन और संकलन किया। २८ व्यासों में ये नवम थे (११,०२०-१०,३०० ईपू)। गर्ग संहिता (६/१४/८) में अपान्तरतमा द्वारा गौतम-पुत्र मेधावी को पर्वत बनने का शाप, ये गौतमी तट पर रहते थे। (७/४०/३५) में अपान्तरतमा ऋषि द्वारा हरिण उपद्वीप (मलगासी द्वीप, मृगव्याध या मृगतस्कर = मगाडास्कर) में तप, अपान्तरतमा आश्रम में गरुड के पक्ष का पतन, (७/४२/२३) में अपान्तरतमा शकुनि द्वारा शम्बर आदि दैत्यों को मोक्ष उपाय रूप में भक्ति के प्रकारों का कथन, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण (१/८/२७) में अपान्तरतमा ऋषि का ब्रह्मा के गले से प्रादुर्भाव), (१/१२/४) में ब्रह्मा – पुत्र, (१/२२/१७) में अपान्तरतमा नाम की निरुक्ति, तैत्तिरीय आरण्यक (८/९) सायण भाष्य में अपान्तरतमा का जन्मान्तर में कृष्ण द्वैपायन व्यास बनना।)

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