सरस्वती का ओङ्कार पञ्जर स्तोत्र

अरुण कुमार उपाध्याय धर्मज्ञ) यह तृतीय कालिदास की रचना है, जो संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य की १० पीढ़ी बाद के भोजराज

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मंत्रोच्चार के बाद क्यों होता हैं ॐ शांति

आदित्य नारायण झा-हिन्दू धर्म में किसी भी पवित्र मंत्रोच्चार के बाद, ऊं शांति शब्द को तीन बार दोहराया जाता है।

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चण्डी पाठ के ३ बीजमन्त्र

श्रीअरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)-(१) ऐं सरस्वती का बीज मन्त्र है। ऐं आश्चर्य तथा जिज्ञासा के लिए कहा जाता है जिससे

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महामृत्युञ्जय मन्त्र

१. मूल मन्त्र- ऋषि-वसिष्ठ मैत्रावरुणि, छन्द अनुष्टुप्, देवता-रुद्र (मृत्यु विमोचनी ऋक्) त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्॥ (ऋक्, ७/५९/१२, वाज.

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जगन्नाथ स्मरण

श्री अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ) महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे, वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना। सुभद्रा मध्यस्थः सकल सुर सेवावसरदो, जगन्नाथ

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श्रीरामजी उपासना के विविध प्रकार

कृतिका खत्री-(सनातन संस्था) तिलक लगाना श्रीरामजी के पूजन से पूर्व उपासक स्वयं को श्रीविष्णु समान खडी दो रेखाओं का अथवा

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ॐकार पञ्जर स्तोत्र-सरस्वती वन्दना

अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ) यह तृतीय कालिदास की रचना है। प्रथम कालिदास शुङ्ग वंश के द्वितीय राज अग्निमित्र के समकालीन थे

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श्री रुद्राष्टकम

श्री रुद्राष्टकम

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो

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सेवा और आत्मसमर्पण के प्रतीक श्रीहनुमान

सेवा और आत्मसमर्पण के प्रतीक श्रीहनुमान

श्रीहनुमानजी का चरित्र सेवा और आत्मसमर्पण का प्रत्यक्ष रूप हैं। वाल्मिकी रामायण के अनुशीलन से जान पडता हैं कि हनुमानजी

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वेद और सूर्य देव का महात्म्य

वेद और सूर्य देव का महात्म्य

वैदिक वाङ्मय सूर्यदेवता के महात्म्य, उनकी विश्व संचालन में चेतनात्मक भूमिका तथा सूर्योपासना के लाभों के विवरणों से भरा पड़ा

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